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श्लोक 6.91.30-31  |
एवमुक्त्वा तु हैडिम्बो महद् विस्फार्य कार्मुकम्॥ ३०॥
संदश्य दशनैरोष्ठं सृक्किणी परिसंलिहन्।
शरवर्षेण महता दुर्योधनमवाकिरत्।
पर्वतं वारिधाराभि: प्रावृषीव बलाहक:॥ ३१॥ |
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| अनुवाद |
| ऐसा कहकर हिडिम्बापुत्र ने अपने होठ दांतों से काटते हुए तथा जीभ से मुंह के कोनों को चाटते हुए अपना विशाल धनुष खींचा और दुर्योधन पर बाणों की भारी वर्षा की, जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत शिखरों पर जल की धाराएं बरसाते हैं। |
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| Having said this, Hidimba's son, biting his lips with his teeth and licking the corners of his mouth with his tongue, drew his huge bow and showered a heavy shower of arrows on Duryodhan, just like the clouds pour streams of water on the mountain peaks during the rainy season. |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि हैडिम्बयुद्धे एकनवतितमोऽध्याय:॥ ९१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें घटोत्कच-युद्धविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९१॥
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