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mahabharat 6.9.73-74: देवताओं के शरीर में स्थित प्राणियों के लिए और मनुष्यों के शरीर में स्थित प्राणियों के लिए भी यह भूमि फलदायी है, और यही उनका परम आश्रय है। हे भरतश्रेष्ठ! जैसे कुत्ते मांस के टुकड़े के लिए लड़ते और एक-दूसरे को नोचते हैं, वैसे ही राजा लोग इस पृथ्वी को भोगने की इच्छा से आपस में लड़ते और लूटते हैं; परंतु आज तक किसी की भी कामना तृप्त नहीं हुई है। ॥ 73-74॥   |   mahabharat अध्याय 6.9: भारतवर्षकी नदियों, देशों तथा जनपदोंके नाम और भूमिका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 9: भारतवर्षकी नदियों, देशों तथा जनपदोंके नाम और भूमिका महत्त्व  »  श्लोक 73-74
 
 
श्लोक  6.9.73-74 
देवमानुषकायानां कामं भूमि: परायणम्।
अन्योन्यस्यावलुम्पन्ति सारमेया यथामिषम्॥ ७३॥
राजानो भरतश्रेष्ठ भोक्तुकामा वसुंधराम्।
न चापि तृप्ति: कामानां विद्यतेऽद्यापि कस्यचित्॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
देवताओं के शरीर में स्थित प्राणियों के लिए और मनुष्यों के शरीर में स्थित प्राणियों के लिए भी यह भूमि फलदायी है, और यही उनका परम आश्रय है। हे भरतश्रेष्ठ! जैसे कुत्ते मांस के टुकड़े के लिए लड़ते और एक-दूसरे को नोचते हैं, वैसे ही राजा लोग इस पृथ्वी को भोगने की इच्छा से आपस में लड़ते और लूटते हैं; परंतु आज तक किसी की भी कामना तृप्त नहीं हुई है। ॥ 73-74॥
 
This land, which is fruitful for the beings in the body of gods and for the beings in the body of humans, is their ultimate refuge. O best of the Bharatas! Just as dogs fight and scratch each other for a piece of meat, in the same way kings fight and plunder each other with the desire to enjoy this earth; but till date no one has been satisfied with his desires. ॥ 73-74॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)