श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 89: कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध और भयानक जनसंहार  » 
 
 
अध्याय 89: कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध और भयानक जनसंहार
 
श्लोक 1:  धृतराष्ट्र बोले- संजय! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य ने जब देखा कि युद्ध में एक ही भीमसेन के द्वारा मेरे बहुत से पुत्र मारे गए, तो उन्होंने क्या किया?॥1॥
 
श्लोक 2:  मेरे पुत्र दिन-प्रतिदिन नष्ट हो रहे हैं। हे सूत! मैं समझता हूँ कि हम सब घोर दुर्भाग्य से पीड़ित हैं।
 
श्लोक 3-5:  मेरे पुत्र दुर्भाग्य के कारण ही हार रहे हैं, जीत नहीं रहे हैं। जहाँ भीष्म, द्रोण, महामनस्वी कृपाचार्य, वीर भूरिश्रवा, भगदत्त, अश्वत्थामा तथा अन्य वीर योद्धाओं के साथ रहते हुए भी मेरे पुत्र प्रतिदिन युद्ध में मारे जाते हैं, वहाँ दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या कारण हो सकता है?॥ 3-5॥
 
श्लोक 6-8:  मूर्ख दुर्योधन ने पहले मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया था। पितामह! मैंने, भीष्म, विदुर और गांधारी ने भी मूर्ख दुर्योधन के कल्याण की इच्छा से उसे सदैव ऐसा करने से रोकने का प्रयत्न किया था, किन्तु आसक्ति के कारण वह हमारी बातें नहीं समझता था। अब उसे उसका फल प्राप्त हो गया है, जिसके कारण भीमसेन प्रतिदिन युद्धभूमि में मेरे मूर्ख पुत्रों को यमलोक भेज रहे हैं।
 
श्लोक 9:  संजय ने कहा - प्रभु ! उस समय आपने विदुरजी के कहे हुए अच्छे और हितकारी वचनों को नहीं सुना (सुनकर भी उन पर ध्यान नहीं दिया) और आपको यह फल प्राप्त हुआ है॥9॥
 
श्लोक 10-11:  उन्होंने कहा था, ‘अपने पुत्रों को जुआ खेलने से रोको। पाण्डवों के साथ विश्वासघात मत करो।’ तुम्हारा कल्याण चाहने वाले अन्य मित्रों ने भी तुमसे यही बातें कही थीं; किन्तु जैसे मरते हुए मनुष्य को हितकारी औषधि अच्छी नहीं लगती, वैसे ही तुमने उन हितकारी वचनों को सुनना भी नहीं चाहा। अतः जो फल महान विदुर ने तुमसे कहा था, वह तुम्हें प्राप्त हुआ है॥10-11॥
 
श्लोक 12:  विदुर, द्रोण, भीष्म और अन्य हितैषियों के हितकारी वचनों को न सुनने के कारण ही ये कौरव नष्ट हो रहे हैं ॥12॥
 
श्लोक 13:  हे प्रजा की रक्षा करने वाले राजा! यह सब तो तुम्हें पहले से ही उपलब्ध है। अब युद्ध का विवरण सुनो, जैसा हुआ था वैसा ही। ॥13॥
 
श्लोक 14:  महाराज! उस दिन दोपहर तक अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया, जो सम्पूर्ण जगत के योद्धाओं का नाश करने वाला था। मैं वह सब तुम्हें बता रहा हूँ, कृपया सुनो।
 
श्लोक 15:  तत्पश्चात् धर्मपुत्र युधिष्ठिर की आज्ञा से उनकी समस्त सेनाएँ क्रोध में भरकर भीष्म पर टूट पड़ीं। वे भीष्म को मार डालना चाहती थीं ॥15॥
 
श्लोक 16:  महाराज! धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और महारथी सात्यकि- ये सब अपनी-अपनी सेनाओं के साथ भीष्म पर टूट पड़े॥16॥
 
श्लोक 17:  राजा विराट और समस्त सोमकों के साथ द्रुपद ने युद्ध में महारथी भीष्म पर आक्रमण किया ॥17॥
 
श्लोक 18:  हे पुरुषों! कवचधारी केकय, धृष्टकेतु और कुन्तीभोज, ये सब अपनी-अपनी सेनाओं सहित भीष्म पर टूट पड़े॥18॥
 
श्लोक 19:  अर्जुन, द्रौपदी के पांचों पुत्र और पराक्रमी चेकितान ने दुर्योधन द्वारा भेजे गए सभी राजाओं पर आक्रमण कर दिया।
 
श्लोक 20:  वीर अभिमन्यु, महारथी घटोत्कच और क्रोधित भीमसेन सभी ने कौरवों पर आक्रमण कर दिया।
 
श्लोक 21:  महाराज! पांडव तीन दलों में बँटकर कौरवों का संहार करने लगे। इसी प्रकार कौरव भी युद्धभूमि में अपने शत्रुओं का संहार करने लगे।
 
श्लोक 22:  द्रोणाचार्य ने क्रोधपूर्वक श्रेष्ठ सारथी सोमक और सृंजय पर आक्रमण कर उन्हें यमलोक भेज दिया।
 
श्लोक 23:  राजन! जब महाबली सृंजय को धनुर्धर द्रोणाचार्य ने रणभूमि में मार डाला, तब उसकी महान् चीख सुनाई दी ॥23॥
 
श्लोक 24:  द्रोणाचार्य द्वारा मारे गए बहुत से क्षत्रिय युद्धभूमि में रोगियों के समान पीड़ा से तड़पते हुए दिखाई दिए॥ 24॥
 
श्लोक 25:  हे भरतनन्दन! योद्धाओं के चिल्लाने, विलाप करने और भूखे मनुष्यों की भाँति दहाड़ने की ध्वनि निरन्तर सुनाई दे रही थी।
 
श्लोक 26:  इसी प्रकार क्रोध में भरे हुए महाबली भीमसेन ने कौरव सैनिकों को मृत्यु के समान मारना आरम्भ कर दिया।
 
श्लोक 27:  उस महायुद्ध में एक भयंकर नदी बह रही थी, जिसमें एक-दूसरे को मार रहे सैनिकों का खून बह रहा था।
 
श्लोक 28:  महाराज! कौरवों और पाण्डवों का वह भयंकर युद्ध यमलोक का आकार बढ़ाने वाला था।
 
श्लोक 29:  तब युद्ध में अत्यन्त वीर भीमसेन क्रोधित होकर हाथियों की सेना में घुस गये और उन्हें मृत्यु के मुख में भेजने लगे।
 
श्लोक 30:  भारत! वहाँ भीम के बाणों से पीड़ित हुए हाथी गिर पड़ेंगे, चिंघाड़ेंगे, बैठ जायेंगे या सब दिशाओं में घूमने लगेंगे॥30॥
 
श्लोक 31:  आर्य! सूँड़ आदि अंग कट जाने से हाथी भयभीत होकर सारसों के समान चिंघाड़ने लगे और नीचे गिर पड़े॥31॥
 
श्लोक 32-33h:  नकुल और सहदेव ने घुड़सवारों की सेना पर आक्रमण कर दिया। हे राजन! उन घोड़ों ने सोने की कलगी और सोने के अन्य आभूषण पहने हुए थे। वे सभी सैकड़ों-हजारों की संख्या में गिरते हुए दिखाई दिए।
 
श्लोक 33-34:  राजन! सारी पृथ्वी गिरे हुए घोड़ों के शरीरों से आच्छादित थी। कुछ की जीभें बाहर निकली हुई थीं, कुछ भारी साँस ले रहे थे, कुछ अस्पष्ट स्वर निकाल रहे थे और कुछ प्राण त्याग चुके थे। हे पुरुषश्रेष्ठ! यह पृथ्वी अत्यंत सुन्दर लग रही थी, क्योंकि यह नाना रूपों वाले घोड़ों से आच्छादित थी।
 
श्लोक 35:  हे भरत! हे प्रजानाथ! युद्ध में अर्जुन द्वारा मारे गए राजाओं से भरी हुई वह रणभूमि बड़ी भयानक लग रही थी।
 
श्लोक 36-38:  हे राजन! टूटे हुए रथों, कटी हुई ध्वजाओं, टुकड़े-टुकड़े हुए विशाल अस्त्र-शस्त्रों, पंखों, थालियों, अत्यन्त चमकते हुए छत्रों, स्वर्ण के हारों, बाजूबंदों, कुण्डलों से विभूषित सिरों, गिरे हुए सिर के आभूषणों (पगड़ियों आदि), ध्वजाओं, सुन्दर अलंकरणों, लालटेनों और लगामों आदि से आच्छादित वह युद्धभूमि ऐसी प्रतीत हो रही थी, मानो वसन्त ऋतु में उस पर नाना प्रकार के फूल गिरे हों।
 
श्लोक 39-40:  भरत! शान्तनुपुत्र भीष्म, द्रोणाचार्य, महारथियों में श्रेष्ठ, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा के क्रोध के कारण पाण्डव सैनिकों का भी इसी प्रकार संहार हुआ था। पाण्डवों के क्रोध के कारण ही आपके योद्धाओं का भी ऐसा ही भयंकर विनाश हुआ था॥39-40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)