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श्लोक 6.85.30-31h  |
तदस्त्रमस्त्रेण विदार्यमाणं
खस्था: सुरा ददृशु: पार्थिवाश्च।
भीष्मस्तु राजन् समरे महात्मा
धनुश्च चित्रं ध्वजमेव चापि॥ ३०॥
छित्त्वानदत् पाण्डुसुतस्य वीरो
युधिष्ठिरस्याजमीढस्य राज्ञ:। |
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| अनुवाद |
| आकाश में खड़े हुए देवताओं और युद्धभूमि में आये हुए राजाओं ने शिखण्डी के दिव्यास्त्र से शल्य के अस्त्र को छिन्न-भिन्न होते देखा। राजन! महात्मा और वीर भीष्म अजमीढ़कुलनन्दन पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर के विचित्र धनुष और ध्वजा को काटकर युद्धभूमि में गर्जना करने लगे। 30 1/2॥ |
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| The gods standing in the sky and the kings who had come to the battlefield saw Shalya's weapon being shattered by Shikhandi's divine weapon. Rajan! Mahatma and brave Bhishma started roaring in the battlefield by cutting the strange bow and flag of King Yudhishthira, son of Ajamidhkulnandan Pandu. 30 1/2॥ |
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