श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 85: अर्जुनका पराक्रम, पाण्डवोंका भीष्मपर आक्रमण, युधिष्ठिरका शिखण्डीको उपालम्भ और भीमका पुरुषार्थ  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  6.85.20-21 
उक्त्वा तथा त्वं पितुरग्रतो मा-
महं हनिष्यामि महाव्रतं तम्।
भीष्मं शरौघैर्विमलार्कवर्णै:
सत्यं वदामीति कृता प्रतिज्ञा॥ २०॥
त्वया च नैनां सफलां करोषि
देवव्रतं यन्न निहंसि युद्धे।
मिथ्याप्रतिज्ञो भव मात्र वीर
रक्ष स्वधर्मं स्वकुलं यशश्च॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वीर! तुमने अपने पिता के समक्ष मुझसे प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं निर्मल सूर्य के समान तेजस्वी बाणों के समूह द्वारा महापराक्रमी भीष्म को अवश्य मार डालूँगा, यह मैं सत्य कहता हूँ।’ तुमने यह प्रतिज्ञा की थी; परंतु तुमने यह प्रतिज्ञा पूरी नहीं की। इसका कारण यह है कि तुम युद्ध में देवव्रत भीष्म को नहीं मार रहे हो। मिथ्या मत बोलो। अपने धर्म, कुल और यश की रक्षा करो।॥ 20-21॥
 
Valiant! You had promised me in front of your father that 'I will surely kill the great vow-holder Bhishma with a group of arrows as bright as the pure Sun, I am saying this truth.' You had promised this; but you did not fulfill this promise. The reason is that you are not killing Devavrata Bhishma in the war. Do not be a liar. Protect your religion, clan and fame.॥ 20-21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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