श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 83: इरावान‍्के द्वारा विन्द और अनुविन्दकी पराजय, भगदत्तसे घटोत्कचका हारना तथा मद्रराजपर नकुल और सहदेवकी विजय  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  6.83.41-42 
तं विजित्य रणे शूरं विक्रान्तं ख्यातपौरुषम्।
अजेयं समरे वीरं यमेन वरुणेन च॥ ४१॥
पाण्डवीं समरे सेनां सम्ममर्द स कुञ्जर:।
यथा वनगजो राजन् मृद्नंश्चरति पद्मिनीम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
महाराज! घटोत्कच अपने पुरुषार्थ के लिए विख्यात था, एक वीर एवं पराक्रमी योद्धा था। उस वीर योद्धा को वरुण और यमराज भी युद्धभूमि में पराजित नहीं कर सके। उसे युद्धभूमि में पराजित करने के पश्चात भगदत्त का हाथी युद्धभूमि में पाण्डव सेना को उसी प्रकार कुचलने लगा, जैसे कोई जंगली हाथी तालाब में कमल के फूल को रौंदता फिरता है।
 
King! Ghatotkacha was famous for his manliness, was a valiant and brave warrior. Even Varuna and Yamraj could not defeat that brave warrior in the battlefield. After defeating him in the battlefield, Bhagadatta's elephant started crushing the Pandava army in the battlefield in the same way as a wild elephant roams around trampling a lotus flower in a pond.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)