श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 83: इरावान‍्के द्वारा विन्द और अनुविन्दकी पराजय, भगदत्तसे घटोत्कचका हारना तथा मद्रराजपर नकुल और सहदेवकी विजय  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.83.34 
स ताडॺमानो बहुभि: शरै: संनतपर्वभि:।
न विव्यथे राक्षसेन्द्रो भिद्यमान इवाचल:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जैसे बहुत से मुड़े हुए गांठों वाले बाणों से छेदे जाने पर भी पर्वत छेदा जाता है, वैसे ही राक्षसराज घटोत्कच न तो व्याकुल हुआ और न ही विचलित हुआ ॥34॥
 
Like a mountain being pierced even after being hit by many arrows with bent knots, the demon king Ghatotkacha was not distressed or perturbed. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)