श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 83: इरावान‍्के द्वारा विन्द और अनुविन्दकी पराजय, भगदत्तसे घटोत्कचका हारना तथा मद्रराजपर नकुल और सहदेवकी विजय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.83.2 
न चैव मामकं किंचिद्‍धृष्टं शंससि संजय।
नित्यं पाण्डुसुतान् हृष्टानभग्नान् सम्प्रशंससि॥ २॥
 
 
अनुवाद
किन्तु हे सूत! अब तक आपने मेरे साथ घटित किसी भी हर्षपूर्ण घटना का वर्णन नहीं किया है; इसके विपरीत आप प्रतिदिन पाण्डवों को आनन्द से परिपूर्ण तथा अपराजित बताते हैं।
 
But, Suta, till now you have not spoken of any joyous event that has happened to me; on the contrary, you are describing the Pandavas as full of joy and undefeated every day.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)