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श्लोक 6.79.32  |
ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले।
विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम्॥ ३२॥ |
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| अनुवाद |
| उन बाणों की पूंछ और सिरे सुनहरे थे। विकर्ण के रक्त से सने वे बाण ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो पृथ्वी पर रक्त वमन कर रहे हों। |
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| The tails and heads of those arrows were golden. The arrows soaked in Vikarna's blood appeared as if they were vomiting blood on the earth. |
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