श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 76: धृतराष्ट्रकी चिन्ता  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.76.2 
हृष्टमस्माकमत्यन्तमभिकामं च न: सदा।
प्रह्वमव्यसनोपेतं पुरस्ताद् दृष्टविक्रमम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
हमारी यह सेना सदैव हमारे प्रति प्रसन्न और स्नेही रहती है। यह सदैव हमारे प्रति विनम्र रही है। यह किसी व्यसन में नहीं फँसी है। इसका पराक्रम पहले भी देखा जा चुका है।॥2॥
 
This army of ours is always happy and affectionate towards us. It has always been humble towards us. It is not trapped in any addiction. Its valour has been seen in the past.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)