श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 74: सात्यकि और भूरिश्रवाका युद्ध, भूरिश्रवाद्वारा सात्यकिके दस पुत्रोंका वध, अर्जुनका पराक्रम तथा पाँचवें दिनके युद्धका उपसंहार  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  6.74.3-4 
तस्य विक्षिपतश्चापं शरानन्यांश्च मुञ्चत:।
आददानस्य भूयश्च संदधानस्य चापरान्॥ ३॥
क्षिपतश्च परांस्तस्य रणे शत्रून् विनिघ्नत:।
ददृशे रूपमत्यर्थं मेघस्येव प्रवर्षत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जब वह धनुष खींचकर एक के बाद एक बाण चलाता, फिर नये बाण हाथ में लेकर धनुष पर चढ़ाता, शत्रुओं पर चलाता और उन्हें मार डालता, उस समय उसका रूप वर्षा करने वाले मेघ के समान अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होता था॥3-4॥
 
When he would draw his bow, shoot one arrow after another, then take new arrows in his hand, put them on the bow, shoot them at his enemies and kill them, at that time his appearance would appear very wonderful, like a rain-bearing cloud. ॥3-4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)