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mahabharat 6.73.14-15: शत्रुओं को संताप देने वाले रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने यह सोचकर कि अश्वत्थामा मेरे गुरु का पुत्र है, द्रोण का प्रिय पुत्र है और ब्राह्मण होने के कारण मेरे लिए विशेष पूजनीय है; आचार्यपुत्र को धन्य कहा॥14-15॥   |   mahabharat अध्याय 6.73: विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 73: विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  6.73.14-15 
ममैष आचार्यसुतो द्रोणस्यापि प्रिय: सुत:।
ब्राह्मणश्च विशेषेण माननीयो ममेति च॥ १४॥
समास्थाय मतिं वीरो बीभत्सु: शत्रुतापन:।
कृपां चक्रे रथश्रेष्ठो भारद्वाजसुतं प्रति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
शत्रुओं को संताप देने वाले रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने यह सोचकर कि अश्वत्थामा मेरे गुरु का पुत्र है, द्रोण का प्रिय पुत्र है और ब्राह्मण होने के कारण मेरे लिए विशेष पूजनीय है; आचार्यपुत्र को धन्य कहा॥14-15॥
 
Arjuna, the best among the charioteers who torments the enemies, thinking that Ashwatthama is the son of my teacher, the beloved son of Drona and because of being a Brahmin, he is especially honorable for me; Blessed the son of Acharya. 14-15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)