श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 73: विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध  » 
 
 
अध्याय 73: विराट-भीष्म, अश्वत्थामा-अर्जुन, दुर्योधन-भीमसेन तथा अभिमन्यु और लक्ष्मणके द्वन्द्व-युद्ध
 
श्लोक 1:  संजय कहते हैं: हे राजन! महारथी राजा विराट ने महारथी भीष्म को तीन बाणों से घायल कर दिया तथा उन्हीं तीन बाणों से उनके घोड़ों को भी घायल कर दिया।
 
श्लोक 2:  तदनन्तनुपुत्र महाधनुर्धर भीष्म ने सुवर्ण पंख वाले दस बाणों से विराट को घायल कर दिया।
 
श्लोक 3:  महाबली अश्वत्थामा ने भयंकर धनुष धारण करके अपने हाथों का बल प्रदर्शित किया और गांडीवधारी अर्जुन की छाती में छः बाण मारे।
 
श्लोक 4:  तब शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले अर्जुन ने अश्वत्थामा का धनुष काट डाला और तीन तीखे बाणों से उसे बुरी तरह घायल कर दिया।
 
श्लोक 5-6:  राजा! युद्ध में अर्जुन द्वारा अपने धनुष का कट जाना अश्वत्थामा सहन न कर सका। क्रोध से अचेत हुए उस महारथी ने तुरंत ही दूसरा धनुष लेकर नब्बे तीखे बाणों से अर्जुन को घायल कर दिया और सत्तर उत्तम बाणों से श्रीकृष्ण को घायल कर दिया।
 
श्लोक 7-9:  तब श्रीकृष्ण सहित अर्जुन ने विचार करके और बार-बार दीर्घ गर्म श्वास लेकर अपने बाएं हाथ से धनुष पर दबाव डाला। तब गांडीवधारी और शत्रुओं का संहार करने वाले पार्थ ने क्रोधित होकर हाथ में मुड़ी हुई गांठों वाले कुछ भयंकर बाण ले लिए, जो जीवन का अंत करने वाले थे। बलवानों में श्रेष्ठ अर्जुन ने उन बाणों से युद्धस्थल में अश्वत्थामा को तत्काल घायल कर दिया।
 
श्लोक 10:  वे बाण उसके कवच को फाड़कर उस रणभूमि से उसके शरीर का रक्त पीने लगे, परंतु गांडीवधारी अर्जुन द्वारा छेदे जाने पर भी अश्वत्थामा व्यथित नहीं हुआ॥10॥
 
श्लोक 11:  राजन! द्रोणकुमार तनिक भी विचलित हुए बिना युद्धस्थल में बाणों की वर्षा करते रहे और अपनी महान प्रतिज्ञा की रक्षा की इच्छा से युद्ध में डटे रहे॥11॥
 
श्लोक 12:  युद्धस्थल में श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों का सामना करने वाले अश्वत्थामा ने उनके इस महान कार्य की प्रशंसा की, कौरवश्रेष्ठों ने॥12॥
 
श्लोक d1:  हे भारत! अर्जुन भी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने युद्धस्थल में उपस्थित समस्त भूतगणों के सामने अश्वत्थामा की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
 
श्लोक 13:  द्रोणाचार्य से दुर्लभतम अस्त्र-शस्त्रों का प्रशिक्षण प्राप्त करके, वह सदैव पांडव सैनिकों के साथ निर्भय होकर युद्ध करता था।
 
श्लोक 14-15:  शत्रुओं को संताप देने वाले रथियों में श्रेष्ठ अर्जुन ने यह सोचकर कि अश्वत्थामा मेरे गुरु का पुत्र है, द्रोण का प्रिय पुत्र है और ब्राह्मण होने के कारण मेरे लिए विशेष पूजनीय है; आचार्यपुत्र को धन्य कहा॥14-15॥
 
श्लोक 16:  तत्पश्चात्, वीर कुन्तीपुत्र अर्जुन ने श्वेत घोड़ों पर सवार होकर अश्वत्थामा को युद्धभूमि में छोड़कर आपके अन्य सैनिकों के साथ बड़ी शीघ्रता से युद्ध आरम्भ कर दिया और उन्हें मार डाला।
 
श्लोक 17:  दुर्योधन ने गर्व और अभिमान से युक्त होकर पंखयुक्त अथवा सुवर्णमय पंखवाले दस बाण चलाकर महाधनुर्धर भीमसेन को बड़ी चोट पहुँचाई॥17॥
 
श्लोक 18-19:  इससे भीमसेन को बहुत क्रोध आया। उन्होंने एक विचित्र धनुष हाथ में लिया, जो अत्यंत शक्तिशाली और शत्रुओं के प्राण लेने में सक्षम था। उन्होंने उस पर दस तीखे बाण चढ़ाए; फिर धनुष को कान तक खींचकर बाण छोड़े। उन सीधे, तीव्र और तीखे बाणों से भीम ने तुरन्त और बिना किसी उतावलेपन के कुरुराज दुर्योधन की छाती पर गहरा घाव कर दिया।
 
श्लोक 20:  दुर्योधन की छाती पर स्वर्ण-सूत्र में पिरोई हुई मणि शोभा पा रही थी। भीमसेन के बाणों से आवृत होकर वह ऐसी शोभा पा रही थी, जैसे आकाश में ग्रहों से घिरा हुआ सूर्य शोभा पाता है। 20॥
 
श्लोक 21:  भीमसेन के बाणों से पीड़ित होकर आपका तेजस्वी पुत्र उसके प्रहारों को उसी प्रकार सहन नहीं कर सका, जैसे मतवाला हाथी ताली की ध्वनि सहन नहीं कर सकता॥21॥
 
श्लोक 22:  महाराज! तत्पश्चात् क्रोध में भरे हुए दुर्योधन ने पत्थरों पर रगड़कर तीखे किए हुए सुवर्णमय बाणों द्वारा भीमसेन को घायल कर दिया और पाण्डवों की सेना को भयभीत करने लगा॥22॥
 
श्लोक 23:  आपके दोनों पराक्रमी पुत्र दुर्योधन और भीमसेन उस रणभूमि में परस्पर युद्ध करके अत्यन्त घायल हो गए थे और देवताओं के समान प्रतीत होने लगे॥ 23॥
 
श्लोक 24:  शत्रुवीरों का नाश करने वाले सुभद्राकुमार अभिमन्यु ने पुरुषश्रेष्ठ चित्रसेन को दस बाणों से और पुरुमित्र को सात बाणों से घायल कर दिया॥24॥
 
श्लोक 25:  युद्ध में इन्द्र के समान पराक्रमी अभिमन्यु ने सत्तर बाणों से सत्यव्रत को घायल कर दिया और फिर युद्धभूमि में नाचते हुए हम सब लोगों को महान कष्ट पहुँचाया।
 
श्लोक 26:  फिर चित्रसेन ने अभिमन्यु को दस बाणों से, सत्यव्रत को नौ बाणों से तथा पुरुमित्र को सात बाणों से घायल कर दिया।
 
श्लोक 27:  उन दोनों से घायल होकर तथा शरीर से रक्त बहता हुआ अभिमन्यु ने शत्रुओं का नाश करने वाले चित्रसेन के महान एवं विचित्र धनुष को काट डाला॥27॥
 
श्लोक 28-29:  इसके अतिरिक्त उन्होंने चित्रसेन का कवच भी भेदकर उसकी छाती में बाण मारा। तत्पश्चात् आपके वीर एवं पराक्रमी राजकुमार युद्धभूमि में एकत्र हुए और क्रोध में भरकर अभिमन्यु को तीखे बाणों से घायल करने लगे; किन्तु श्रेष्ठ अस्त्रों के स्वामी अभिमन्यु ने अपने तीखे बाणों से उन सबको घायल कर दिया।
 
श्लोक 30:  जैसे वन में प्रचण्ड अग्नि घास को जलाकर भस्म कर देती है, वैसे ही अभिमन्यु युद्धस्थल में कौरव सेना को जला रहा था। उसके इस महान् कार्य को देखकर आपके पुत्रों ने उसे चारों ओर से घेर लिया॥30॥
 
श्लोक 31:  महाराज! आपकी सेना का संहार करते समय सुभद्रापुत्र अभिमन्यु ग्रीष्म ऋतु में प्रज्वलित होने वाली प्रचण्ड अग्नि से भी अधिक शोभायमान हो रहा था।
 
श्लोक 32:  हे प्रजानाथ! उसका पराक्रम देखकर आपके पौत्र लक्ष्मण तुरन्त ही सुभद्रापुत्र का सामना करने के लिए युद्ध में आ पहुँचे।
 
श्लोक 33:  तब क्रोध में भरे हुए अभिमन्यु ने उत्तम गुणों से संपन्न लक्ष्मण को छः तीखे बाणों से तथा उनके सारथि को तीन बाणों से घायल कर दिया।
 
श्लोक 34:  महाराज! इसी प्रकार लक्ष्मण ने भी अपने तीखे बाणों से सुभद्रा के पुत्र को घायल कर दिया। महाराज! यह अद्भुत बात थी।
 
श्लोक 35:  यह देखकर सुभद्रा के पराक्रमी पुत्र ने लक्ष्मण के चारों घोड़ों और सारथि को मार डाला और फिर उन पर तीखे बाणों से आक्रमण किया।
 
श्लोक 36:  शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले लक्ष्मण ने उस अश्वरहित रथ पर खड़े होकर क्रोध में भरकर अभिमन्यु के रथ की ओर एक बल का प्रहार किया ॥36॥
 
श्लोक 37:  अचानक उस शक्ति को, जो भयंकर और अजेय सर्पिणी के समान थी, अपनी ओर आते देख अभिमन्यु ने अपने तीखे बाणों से उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
 
श्लोक 38:  फिर कृपाचार्य ने सभी सैनिकों के सामने ही लक्ष्मण को अपने रथ पर बिठाया और उन्हें वहां से युद्धभूमि में किसी अन्य स्थान पर ले गए।
 
श्लोक 39:  तत्पश्चात् उस भयंकर संग्राम में समस्त योद्धा प्रतिद्वन्द्वी को मारने की इच्छा से एक दूसरे को मारने के लिए एक दूसरे पर आक्रमण करने लगे ॥39॥
 
श्लोक 40:  आपके महान् धनुर्धर और पाण्डव पक्ष के महारथी युद्ध में एक-दूसरे को मार रहे थे, अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे ॥40॥
 
श्लोक 41:  कवच और रथ से रहित, कटे हुए धनुष वाले, केश खोले हुए अनेक वीर संजय केवल अपनी भुजाओं से ही कौरवों के साथ युद्ध कर रहे थे।
 
श्लोक 42:  तब महाबली और पराक्रमी भीष्म अत्यन्त क्रोधित होकर अपने दिव्यास्त्रों द्वारा महाबली पाण्डवों की सेना का संहार करने लगे॥42॥
 
श्लोक 43:  उस समय वहाँ मारे गए और गिरे हुए हाथियों, घोड़ों, मनुष्यों, रथियों और सवारोंसे सारी पृथ्वी आच्छादित हो गई ॥43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)