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श्लोक  6.70.15 
संरब्धानां च वीराणां धीराणाममितौजसाम्।
धनुर्ज्यातलशब्देन न प्राज्ञायत किंचन॥ १५॥
 
 
अनुवाद
क्रोध में भरे हुए अत्यंत तेजस्वी वीर पुरुषों के धनुषों की टंकार के कारण वहाँ कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था।
 
Nothing could be heard there due to the twirling sound of the bows of the extremely radiant brave men who were filled with anger.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)