श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 68: ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  6.68.3 
भूतं भव्यं भविष्यं च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह।
यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय ने तुम्हें भूत, वर्तमान और भविष्य के विषय में बताया है। वे तुम्हें यज्ञों के यज्ञ और तपों के सार के विषय में बताते हैं।॥3॥
 
‘Markandeya has told you about the past, present and future. He tells you about the yajna of yajnas and the essence of austerities.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)