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mahabharat 6.66.35: राजन! ये श्रीहरि सर्वव्यापी हैं, अंधकार और आसक्ति से रहित हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है॥ 35॥   |   mahabharat अध्याय 6.66: नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 66: नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.66.35 
राजन् सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जित:।
यत: कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जय:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
राजन! ये श्रीहरि सर्वव्यापी हैं, अंधकार और आसक्ति से रहित हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है॥ 35॥
 
King! This Shri Hari is the all-pervading and devoid of darkness and attachment. Wherever there is Shri Krishna, there is Dharma and wherever there is Dharma, there is victory. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)