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mahabharat 6.65.75: सुबाहो! हे दयालु प्रभु, आपकी शरण में आकर सभी प्राणी आपमें निवास करते हैं। ब्राह्मण आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, सीमारहित (असीम) तथा समाज की रक्षा के लिए सेतु के रूप में वर्णित करते हैं। 75.   |   mahabharat अध्याय 6.65: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 65: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  6.65.75 
स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघा:
कृत्वाऽऽश्रयं त्वां वरदं सुबाहो।
अनादिमध्यान्तमपारयोगं
लोकस्य सेतुं प्रवदन्ति विप्रा:॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
सुबाहो! हे दयालु प्रभु, आपकी शरण में आकर सभी प्राणी आपमें निवास करते हैं। ब्राह्मण आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, सीमारहित (असीम) तथा समाज की रक्षा के लिए सेतु के रूप में वर्णित करते हैं। 75.
 
Subaho! Taking shelter in you, the benevolent Lord, all living beings reside in you. The Brahmins describe you as devoid of beginning, middle and end, void of any boundary (limitless) and as a bridge for the protection of the social order. 75.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने पञ्चषष्टितमोऽध्याय:॥ ६५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ७६ श्लोक हैं।]
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)