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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 65: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  6.65.57 
निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर।
अमृतोद्भव सद्भाव मुक्तात्मन् विजयप्रद॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
आप संसार की रचना में स्वाभाविक रूप से संलग्न हैं, आप समस्त कामनाओं के स्वामी हैं। आप अमृत के उद्गम स्थान, सत्यस्वरूप, मुक्तात्मा और विजय देने वाले हैं ॥57॥
 
You are naturally involved in the creation of the world, you are the Lord of all desires. You are the place where nectar originates, the true form, the liberated soul and the one who gives victory. ॥ 57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)