Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 6.65.53: समस्त व्यक्त और अव्यक्त आपका ही स्वरूप है। आपका धाम अनंत और अनंत है। आप इन्द्रियों के नियंत्रक हैं। आपके सभी कर्म शुभ हैं। आपमें कोई वर्ण नहीं है। आप आत्मज्ञानी हैं, स्वभाव से गंभीर हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। आपकी जय हो ॥ 53॥ | mahabharat अध्याय 6.65: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन । mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय।
असंख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीर कामद॥ ५३॥
अनुवाद
समस्त व्यक्त और अव्यक्त आपका ही स्वरूप है। आपका धाम अनंत और अनंत है। आप इन्द्रियों के नियंत्रक हैं। आपके सभी कर्म शुभ हैं। आपमें कोई वर्ण नहीं है। आप आत्मज्ञानी हैं, स्वभाव से गंभीर हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं। आपकी जय हो ॥ 53॥
All the manifest and unmanifest are Your form. Your abode is infinite and endless. You are the controller of the senses. All Your actions are auspicious. You have no class. You know the Self, are serious by nature and fulfill the desires of your devotees. Victory to You. ॥ 53॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥