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mahabharat 6.65.37: हे राजन! अपने समस्त शत्रुओं को दुःख पहुँचाते हुए और अपने बन्धुओं को सुख पहुँचाते हुए, अपने बन्धुओं के साथ सुखपूर्वक रहो और इस पृथ्वी का राज्य भोगो।   |   mahabharat अध्याय 6.65: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 65: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्-स्तुतिका कथन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  6.65.37 
भुङ्क्ष्वेमां पृथिवीं राजन् भ्रातृभि: सहित: सुखी।
दुर्हृदस्तापयन् सर्वान् नन्दयंश्चापि बान्धवान्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! अपने समस्त शत्रुओं को दुःख पहुँचाते हुए और अपने बन्धुओं को सुख पहुँचाते हुए, अपने बन्धुओं के साथ सुखपूर्वक रहो और इस पृथ्वी का राज्य भोगो।
 
O King! While causing pain to all your enemies and joy to your relatives, live happily with your brothers and enjoy the kingdom of this earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)