श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 64: भीमसेन और घटोत्कचका पराक्रम, कौरवोंकी पराजय तथा चौथे दिनके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 55-d1h
 
 
श्लोक  6.64.55-d1h 
स कृत्वा दारुणां मायां भीरूणां भयवर्धिनीम्॥ ५५॥
अदृश्यत निमेषार्धाद् घोररूपं समास्थित:।
ऐरावणं समारूढ: स वै मायाकृतं स्वयम्॥ ५६॥
(कैलासगिरिसंकाशं वज्रपाणिरिवाभ्ययात्।)
 
 
अनुवाद
फिर उसने कायरों का भय बढ़ाने वाली एक अत्यन्त भयंकर माया प्रकट की। क्षण मात्र में ही उसने भयानक रूप धारण कर लिया और आँखों के सामने प्रकट हो गया। घटोत्कच वज्रधारी इन्द्र के समान अपनी माया से उत्पन्न कैलाश पर्वत के समान श्वेत हाथी ऐरावत पर आसीन होकर वहाँ आ पहुँचा।
 
Then he manifested a very dreadful illusion that increased the fear of cowards. In just half a moment he assumed a terrifying form and appeared before the eyes. Ghatotkacha arrived there like Indra wielding the thunderbolt sitting on the white elephant Airavat which was like Mount Kailash created by his own illusion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)