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श्लोक 6.63.32-33  |
न तत्र कश्चिन्नविषण्ण आसी-
दृते राजन् सोमदत्तस्य पुत्रात्।
स वै समादाय धनुर्महात्मा
भूरिश्रवा भारत सौमदत्ति:॥ ३२॥
दृष्ट्वा रथान् स्वान् व्यपनीयमानान्
प्रत्युद्ययौ सात्यकिं योद्धुमिच्छन्॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! उस समय वहाँ सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा के अतिरिक्त और कोई ऐसा योद्धा नहीं था, जो उदास न हो। अपने सारथिओं को विवश होकर भागने पर मजबूर देखकर सोमदत्तकुमार महामना भूरिश्रवाण ने धनुष लेकर युद्ध की इच्छा से सत्य किपर पर आक्रमण किया। 32-33॥ |
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| Rajan! At that time, there was no other warrior there except Bhurishrava, son of Somdutt, who was not depressed. India Seeing his charioteers forced to run away, Somdutt Kumar Mahamana Bhurishravane took the bow and attacked Satya Kipar with the desire to fight. 32-33॥ |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सात्यकिभूरिश्रव:समागमे त्रिषष्टितमोऽध्याय:॥ ६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें सात्यकिभूरिश्रवा-समागमविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६३॥
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