श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 63: युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  6.63.30-31 
अन्वागतं वृष्णिवरं निशम्य
तं शत्रुमध्ये परिवर्तमानम्।
प्रद्रावयन्तं कुरुपुङ्गवांश्च
पुन: पुनश्च प्रणदन्तमाजौ॥ ३०॥
योधास्त्वदीया: शरवर्षैरवर्षन्
मेघा यथा भूधरमम्बुवेगै:।
तथापि तं धारयितुं न शेकु-
र्मध्यन्दिने सूर्यमिवातपन्तम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वृष्णिवंश में श्रेष्ठ सात्यकि आये हैं और शत्रुओं के बीच विचरण करते हुए बार-बार गर्जना करते हुए कौरव सेना के प्रधान-प्रधान योद्धाओं को युद्धभूमि से भगा रहे हैं; यह सुनकर आपके योद्धा उन पर बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे बादल पर्वत पर जल की धाराएँ बरसाते हैं; फिर भी वे दोपहर के समय प्रज्वलित सूर्य के समान उन्हें रोक नहीं सके।
 
Satyaki, the best of the Vrishni clan, has come and is roaming among the enemies and roaring repeatedly while driving away the chief warriors of the Kaurava army from the battlefield; on hearing this your warriors began to shower arrows on him like the clouds pour down torrents of water on a mountain; yet they, like the blazing sun at noon, could not stop him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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