श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 63: युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़  » 
 
 
अध्याय 63: युद्धस्थलमें प्रचण्ड पराक्रमकारी भीमसेनका भीष्मके साथ युद्ध तथा सात्यकि और भूरिश्रवाकी मुठभेड़
 
श्लोक 1:  संजय कहते हैं - महाराज! हाथियों की उस सेना के मारे जाने के बाद आपके पुत्र दुर्योधन ने सभी सैनिकों को एक साथ मिलकर भीमसेन का वध करने की आज्ञा दी।
 
श्लोक 2:  तत्पश्चात् आपके पुत्र की आज्ञा से समस्त सेनाएँ भैरव के समान गर्जना करती हुई भीमसेन पर टूट पड़ीं।
 
श्लोक 3:  सेना का अनंत वेग देवताओं के लिए भी असहनीय था। पूर्णिमा के दिन वह उफनते समुद्र के समान विशाल प्रतीत हो रही थी।
 
श्लोक 4:  सेना का वह समुद्र रथों, हाथियों और घोड़ों से भरा हुआ था। शंख और नगाड़ों की ध्वनि उसे शोरगुल से भर रही थी। रथों और पैदलों की संख्या गिनती से बाहर थी और उस सेना में चारों ओर धूल फैल रही थी।
 
श्लोक 5:  युद्ध में भीमसेन ने उस अविनाशी सैन्य समुद्र को दूसरे समुद्र के समान तट की भाँति रोक दिया ॥5॥
 
श्लोक 6:  राजन! उस समय युद्धस्थल में हमने महाबली पाण्डुनंदन भीमसेन का अत्यन्त अद्भुत अलौकिक कर्म देखा था।
 
श्लोक 7:  वहाँ आगे बढ़ते हुए समस्त राजाओं को, उनके घोड़ों, हाथियों और रथों सहित, भीमसेन ने बिना किसी घबराहट के केवल अपनी गदा के बल से रोक दिया।
 
श्लोक 8:  रथियों में श्रेष्ठ भीमसेन अपनी गदा से सारी सेना को रोककर उस भयंकर युद्ध में मेरु पर्वत के समान स्थिर खड़े रहे।
 
श्लोक 9-10:  उस महान् एवं भयंकर भय के समय पराक्रमी भीमसेन, उनके भाई, उनका पुत्र, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पाँचों पुत्र, अभिमन्यु और अपराजित वीर शिखण्डी इनमें से कोई भी नहीं बचा ॥9-10॥
 
श्लोक 11:  तत्पश्चात् भीमसेन ने अपने हाथ में एक विशाल एवं भारी गदा लेकर, जो पूर्णतया इस्पात की बनी हुई थी, आपके सैनिकों पर उसी प्रकार आक्रमण किया, जैसे यमराज दंड लेकर आपके सैनिकों पर आक्रमण कर रहे हों।
 
श्लोक 12-13h:  तदनन्तर वह महाबली एवं पराक्रमी पाण्डुपुत्र रथियों और घोड़ों के समूह को नष्ट करके प्रलयकाल के यमराज के समान युद्धस्थल में विचरण करने लगा, अपनी भुजाओं के बल से रथों के समूह को खींचता और नष्ट करता हुआ।
 
श्लोक 13-14h:  पाण्डवपुत्र भीम अपने बड़े वेग से रथों के समूहों को तोड़कर नष्ट कर देते थे, तथा पूरी सेना को उसी प्रकार कुचल देते थे, जैसे हाथी सरकण्डों को रौंदता है।
 
श्लोक 14-16h:  महाबाहु भीमसेन ने रथियों को रथों से, हाथियों को हाथियों से, घुड़सवारों को घोड़ों की पीठों से तथा पैदल सैनिकों को पृथ्वी पर पटकते हुए, आपके पुत्र की समस्त सेना को अपनी गदा से उसी प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे वायु अपने वेग से वृक्षों को उखाड़ फेंकती है।
 
श्लोक 16-17h:  उसकी गदा, जो हाथियों और घोड़ों को मार डालती थी, बहुत डरावनी लग रही थी क्योंकि वह मज्जा, चर्बी, मांस और रक्त से ढकी हुई थी।
 
श्लोक 17-18h:  सम्पूर्ण युद्धभूमि मृत्यु का घर प्रतीत हो रही थी, जहाँ मृत मनुष्य, हाथी और घोड़े इधर-उधर पड़े थे।
 
श्लोक 18-19:  लोगों ने भीमसेन की उस भयंकर गदा को देखा, जो विनाश करने में समर्थ थी, रुद्र के पिनाक और यम के दण्ड के समान भयंकर थी, जो प्रलयकाल में प्राणियों का संहार कर देती है। उसकी ध्वनि इन्द्र के वज्र के समान थी।
 
श्लोक 20:  गदा चलाते हुए महापुरुष कुन्तीकुमार भीमसेन का रूप अन्तिम युग के यमराज के समान अत्यन्त भयंकर दिखाई दे रहा था॥20॥
 
श्लोक 21:  उस विशाल सेना को बार-बार खदेड़ने वाले भीमसेन को अपने सामने मृत्यु के समान प्रकट होते देख, समस्त योद्धा दुःखी हो गए ॥21॥
 
श्लोक 22:  भरत! भीमसेन गदा उठाकर जहाँ भी देखते, वहाँ सारी सेना में दरारें पड़ जातीं (वहाँ के सैनिक भागकर स्थान खाली कर देते)।॥ 22॥
 
श्लोक 23-24:  भीमसेन अपने बल से सेना को विदीर्ण कर रहे थे और मृत्यु के समान सब सैनिकों को खाने के लिए तत्पर थे। उस समय विशाल गदा धारण किये हुए भयंकर एवं पराक्रमी भीमसेन को देखकर भीष्मजी सहसा वहाँ आ पहुँचे।
 
श्लोक 25:  वह सूर्य के समान तेजस्वी विशाल रथ पर सवार होकर वहाँ आया, जिसके पहियों की घोर ध्वनि हो रही थी, और वह मेघ के समान बाणों की वर्षा से सब को ढक रहा था।
 
श्लोक 26:  भीष्म को यमराज के समान मुँह खोले हुए आते देख, महाबाहु भीमसेन क्रोध में भरकर उनका सामना करने के लिए आगे बढ़े॥ 26॥
 
श्लोक 27:  उस समय शिनिवंश के प्रधान योद्धा सात्यकि ने, जो सच्चे योद्धा थे, अपने प्रबल धनुष से शत्रुओं का संहार करते हुए तथा आपके पुत्र की सेना को कंपाते हुए पितामह भीष्म पर आक्रमण किया॥27॥
 
श्लोक 28:  भरत! उस समय आपके समस्त सैनिक चाँदी के समान श्वेत घोड़ों पर सवार होकर सुन्दर पंखों से युक्त तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करते हुए जा रहे सात्यकि को रोक न सके।
 
श्लोक 29:  तभी अलम्बुष नामक राक्षस ने उन्हें दस बाणों से घायल कर दिया। तब शिनिके पौत्र ने भी उस राक्षस को चार बाणों से बींधकर बदला लिया और रथ से उतरकर भीष्म पर आक्रमण कर दिया।
 
श्लोक 30-31:  वृष्णिवंश में श्रेष्ठ सात्यकि आये हैं और शत्रुओं के बीच विचरण करते हुए बार-बार गर्जना करते हुए कौरव सेना के प्रधान-प्रधान योद्धाओं को युद्धभूमि से भगा रहे हैं; यह सुनकर आपके योद्धा उन पर बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे बादल पर्वत पर जल की धाराएँ बरसाते हैं; फिर भी वे दोपहर के समय प्रज्वलित सूर्य के समान उन्हें रोक नहीं सके।
 
श्लोक 32-33:  राजन! उस समय वहाँ सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा के अतिरिक्त और कोई ऐसा योद्धा नहीं था, जो उदास न हो। अपने सारथिओं को विवश होकर भागने पर मजबूर देखकर सोमदत्तकुमार महामना भूरिश्रवाण ने धनुष लेकर युद्ध की इच्छा से सत्य किपर पर आक्रमण किया। 32-33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)