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श्लोक 6.62.65  |
महावात इवाभ्राणि विधमित्वा स वारणान्।
अतिष्ठत् तुमुले भीम: श्मशान इव शूलभृत्॥ ६५॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे आँधी बादलों को तितर-बितर कर देती है और उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार भीमसेन उस भयंकर युद्ध में हाथियों की सेना का संहार करके श्मशान में भगवान शिव के समान त्रिशूल धारण किये खड़े थे। |
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| Just as a storm scatters and blows away the clouds, similarly Bhimasena, after destroying the army of elephants in that terrible battle, was standing in the cremation ground like Lord Shiva holding a trident. |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि चतुर्थदिवसे भीमयुद्धे द्विषष्टितमोऽध्याय:॥ ६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिन भीमसेनका युद्धविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥
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