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mahabharat 6.62.1: धृतराष्ट्र बोले - संजय! मैं पुरुषार्थ की अपेक्षा भाग्य को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ, जिसके कारण मेरे पुत्र दुर्योधन की सेना पाण्डव सेना के हाथों कष्ट भोग रही है।   |   mahabharat अध्याय 6.62: धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्षके वीरोंका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 62: धृष्टद्युम्न और शल्य आदि दोनों पक्षके वीरोंका युद्ध तथा भीमसेनके द्वारा गजसेनाका संहार  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  6.62.1 
धृतराष्ट्र उवाच
दैवमेव परं मन्ये पौरुषादपि संजय।
यत् सैन्यं मम पुत्रस्य पाण्डुसैन्येन बाध्यते॥ १॥
 
 
अनुवाद
धृतराष्ट्र बोले - संजय! मैं पुरुषार्थ की अपेक्षा भाग्य को अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ, जिसके कारण मेरे पुत्र दुर्योधन की सेना पाण्डव सेना के हाथों कष्ट भोग रही है।
 
Dhritarashtra said - Sanjaya! I consider destiny to be more important than effort, due to which my son Duryodhan's army is suffering at the hands of the Pandava army.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)