श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  6.59.94 
स वासुदेव: प्रगृहीतचक्र:
संवर्तयिष्यन्निव सर्वलोकम्।
अभ्युत्पतँल्लोकगुरुर्बभासे
भूतानि धक्ष्यन्निव धूमकेतु:॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
वे जगद्गुरु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण हाथ में चक्र धारण किए हुए थे, मानो सम्पूर्ण जगत् का विनाश करने के लिए तत्पर हों और समस्त प्राणियों को भस्म करने के लिए उठती हुई प्रलय की अग्नि के समान प्रकाशित हो रहे थे॥94॥
 
That Jagadguru Vasudevanandan Shri Krishna was holding the Chakra in his hand as if he was ready to destroy the entire world and was shining like the fire of destruction rising to burn all the living beings to ashes. 94॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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