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mahabharat 6.59.93: महेन्द्र के छोटे भाई श्रीकृष्ण क्रोध में भरकर हाथ में चक्र लेकर बड़े जोर से गर्जना कर रहे थे। उन्हें इस रूप में देखकर समस्त प्राणी कौरवों के विनाश की कल्पना करके व्याकुल होकर हाहाकार करने लगे॥93॥   |   mahabharat अध्याय 6.59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  6.59.93 
तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चै:
क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य।
सर्वाणि भूतानि भृशं विनेदु:
क्षयं कुरूणामिव चिन्तयित्वा॥ ९३॥
 
 
अनुवाद
महेन्द्र के छोटे भाई श्रीकृष्ण क्रोध में भरकर हाथ में चक्र लेकर बड़े जोर से गर्जना कर रहे थे। उन्हें इस रूप में देखकर समस्त प्राणी कौरवों के विनाश की कल्पना करके व्याकुल होकर हाहाकार करने लगे॥93॥
 
Mahendra's younger brother Sri Krishna was furious and roaring loudly with the discus in his hand. Seeing him in this form, all beings began to cry in distress, thinking of the destruction of the Kauravas.॥93॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)