श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  6.59.92 
तत् कृष्णकोपोदयसूर्यबुद्धं
क्षुरान्ततीक्ष्णाग्रसुजातपत्रम्।
तस्यैव देहोरुसर: प्ररूढं
रराज नारायणबाहुनालम्॥ ९२॥
 
 
अनुवाद
वह कमल श्रीकृष्ण के क्रोधरूपी सूर्योदय से उत्पन्न हुआ था। उसकी धारें छुरियों के समान तीक्ष्ण थीं। वे ही उसकी सुन्दर पंखुड़ियाँ थीं। वह भगवान् की मूर्ति के रूप में महान सरोवर में उत्पन्न हुआ था और नारायणरूपी श्रीकृष्ण की भुजारूपी डोरी उसकी शोभा बढ़ा रही थी ॥92॥
 
That lotus had grown from the sunrise in the form of Shri Krishna's anger. Its edges were as sharp as knives. They were its beautiful petals. It had grown in the great lake in the form of the Lord's idol and the cord in the form of the arm of Shri Krishna in the form of Narayana was enhancing its beauty. ॥92॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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