श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 90
 
 
श्लोक  6.59.90 
सोऽभिद्रवन् भीष्ममनीकमध्ये
क्रुद्धो महेन्द्रावरज: प्रमाथी।
व्यालम्बिपीतान्तपटश्चकाशे
घनो यथा खे तडितावनद्ध:॥ ९०॥
 
 
अनुवाद
देवराज इन्द्र के छोटे भाई श्रीकृष्ण में समस्त शत्रुओं का नाश करने की शक्ति थी। जब वे सेना के मध्य में भीष्म की ओर क्रोधित होकर झपटे, तो उनके श्याम शरीर पर लटके हुए तथा वायु वेग से लहराते हुए उनके पीत वस्त्र का सिरा उन्हें ऐसी शोभा दे रहा था मानो आकाश में बिजली से आच्छादित कोई काला बादल शोभायमान हो रहा हो।
 
Shri Krishna, the younger brother of Devraja Indra, had the power to destroy all enemies. When he angrily rushed towards Bhishma in the middle of the army, the end of his yellow cloth hanging on his dark body and fluttering with the speed of the wind was giving him such grace as if a dark cloud covered with lightning was adorning the sky.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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