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mahabharat 6.59.74: उन बाणों की अधिकता के कारण समस्त दिशाएँ उनसे आच्छादित हो गईं। न आकाश दिखाई दे रहा था, न दिशाएँ; न पृथ्वी दिखाई दे रही थी, न मृगतृष्णा स्वरूप भगवान भास्कर ही दिखाई दे रहे थे। उस समय धुएँ से भरी हुई भयंकर वायु चलने लगी। समस्त दिशाएँ व्याकुल हो गईं। 74।   |   mahabharat अध्याय 6.59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  6.59.74 
तेषां बहुत्वात् तु भृशं शराणां
दिशश्च सर्वा: पिहिता बभूवु:।
न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि-
र्न भास्करोऽदृश्यत रश्मिमाली।
ववुश्च वातास्तुमुला: सधूमा
दिशश्च सर्वा: क्षुभिता बभूवु:॥ ७४॥
 
 
अनुवाद
उन बाणों की अधिकता के कारण समस्त दिशाएँ उनसे आच्छादित हो गईं। न आकाश दिखाई दे रहा था, न दिशाएँ; न पृथ्वी दिखाई दे रही थी, न मृगतृष्णा स्वरूप भगवान भास्कर ही दिखाई दे रहे थे। उस समय धुएँ से भरी हुई भयंकर वायु चलने लगी। समस्त दिशाएँ व्याकुल हो गईं। 74।
 
Due to the abundance of those arrows, all directions were covered by them. Neither the sky nor the directions were visible; neither the earth was visible, nor even the mirage Lord Bhaskar could be seen. At that time, a fierce wind filled with smoke started blowing. All directions became agitated. 74.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)