श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 68-69
 
 
श्लोक  6.59.68-69 
अमृष्यमाणो भगवान‍् केशव: परवीरहा।
अचिन्तयदमेयात्मा नास्ति यौधिष्ठिरं बलम्॥ ६८॥
एकाह्ना हि रणे भीष्मो नाशयेद् देवदानवान्।
किं नु पाण्डुसुतान् युद्धे सबलान् सपदानुगान्॥ ६९॥
 
 
अनुवाद
यह सब देखकर और सोचकर, जो अमोघ हैं और शत्रु योद्धाओं का संहार करने वाले हैं, भगवान श्रीकृष्ण इसे सहन नहीं कर सके। उन्होंने मन ही मन सोचा कि युधिष्ठिर की सेना तो नष्ट हो जाना चाहती है। भीष्म तो युद्धभूमि में समस्त देवताओं और दानवों का एक ही दिन में संहार कर सकते हैं। फिर उनके लिए पाण्डवों को उनकी सेना और सेवकों सहित युद्ध में परास्त कर देना कौन सी बड़ी बात है?॥ 68-69॥
 
Seeing and thinking all this, Lord Krishna, who is immeasurable and kills enemy warriors, could not tolerate it. He thought to himself that Yudhishthira's army wants to be wiped out. Bhishma can destroy all the gods and demons in the battlefield in a single day. Then what is a big deal for him to defeat the Pandavas along with their army and servants in the war?॥ 68-69॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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