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श्लोक 6.59.138-139  |
इति ब्रुवन्त: शिबिराणि जग्मु:
सर्वे गणा भारत ये त्वदीया:॥ १३८॥
उल्कासहस्रैश्च सुसम्प्रदीप्तै-
र्विभ्राजमानैश्च तथा प्रदीपै:।
किरीटिवित्रासितसर्वयोधा
चक्रे निवेशं ध्वजिनी कुरूणाम्॥ १३९॥ |
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| अनुवाद |
| भरत! उपर्युक्त वचन कहकर आपके सभी सैनिक सहस्रों जलते हुए मसालों और जगमगाते दीपों के प्रकाश में अपने-अपने शिविरों को चले गए। कौरवों की समस्त सेना अर्जुन के भय से भर गई। ऐसी स्थिति में सेना ने रात्रि विश्राम किया। 138-139। |
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| Bharata! Saying the above words, all your soldiers went to their respective camps in the light of thousands of burning spices and glowing lamps. The entire army of Kauravas was filled with the fear of Arjuna. In this state, the army rested for the night. 138-139. |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीयदिवसावहारे एकोनषष्टितमोऽध्याय:॥ ५९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तीसरे दिन सेनाके विश्रामके लिये लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५९॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १४० १/२ श्लोक हैं।] |
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