| श्री महाभारत » पर्व 6: भीष्म पर्व » अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति » श्लोक 134-136h |
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| | | | श्लोक 6.59.134-136h  | तत: प्रजज्ञे तुमुल: कुरूणां
निशामुखे घोरतम: प्रणाद:॥ १३४॥
रणे रथानामयुतं निहत्य
हता गजा: सप्तशतार्जुनेन।
प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे
निपातिता: क्षुद्रकमालवाश्च॥ १३५॥
महत् कृतं कर्म धनंजयेन
कर्तुं यथा नार्हति कश्चिदन्य:। | | | | | | अनुवाद | | उस समय रात्रि के प्रारम्भ में कौरव सेना में भयंकर कोलाहल मच गया। वे आपस में कहने लगे—‘आज अर्जुन ने युद्धस्थल में दस हजार रथियों का नाश कर दिया और सात सौ हाथियों को मार डाला। उसने प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव आदि समस्त क्षत्रियों का वध कर दिया। धनंजय ने जो महान पराक्रम किया है, उसकी तुलना कोई अन्य योद्धा नहीं कर सकता।’॥134-135 1/2॥ | | | | At that time, at the beginning of the night, there was a terrible uproar in the Kaurava army. They started saying among themselves—‘Today Arjun has destroyed ten thousand charioteers and killed seven hundred elephants in the battlefield. He has killed all the Kshatriyas, Prachya, Sauvir, Kshudraka and Malava. The great feat that Dhananjaya has performed cannot be matched by any other warrior.'॥ 134-135 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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