श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 59: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव-सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  6.59.106 
व्याविद्धनिष्काङ्गदकुण्डलं तं
रजोविकीर्णाञ्चितपद्मनेत्रम्।
विशुद्धदंष्ट्रं प्रगृहीतशङ्खं
विचुक्रुशु: प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरा:॥ १०६॥
 
 
अनुवाद
उस समय उनके गले का हार, भुजाओं के बाजूबंद और कानों के कुण्डल हिलने लगे । सेना से उड़ी हुई धूल उनके कमल के समान सुन्दर नेत्रों पर बिखर रही थी । उनके दाँत स्वच्छ और पवित्र थे और वे हाथ में शंख धारण किए हुए थे । श्रीकृष्ण को उस अवस्था में देखकर कौरव पक्ष के प्रमुख योद्धा जयजयकार करने लगे ॥106॥
 
At that time, the necklace around his neck, the armlets on his arms and the earrings in his ears started shaking. The dust raised from the army was scattered on his beautiful eyes like lotus. His teeth were clean and pure and he was holding a conch in his hand. Seeing Shri Krishna in that state, the leading warriors of the Kaurava side started shouting.॥106॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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