धृष्टद्युम्नोऽपि समरे धर्मराजानमभ्ययात्।
तत: प्रववृते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम्॥ ४०॥
कलिङ्गानां च समरे भीमस्य च महात्मन:।
जगत: प्रक्षयकरं घोररूपं भयावहम्॥ ४१॥
अनुवाद
इधर धृष्टद्युम्न भी उस संग्राम में धर्मराज युधिष्ठिर के पास गए। तत्पश्चात, रणभूमि में कलिंग के योद्धाओं और महामनस्वी भीमसेन के बीच अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी युद्ध होने लगा। जो सम्पूर्ण जगत् का संहार करने वाले, भयंकर रूप वाले तथा अत्यन्त डरावने थे। 40-41॥
Here Dhrishtadyumna also went to Dharmaraja Yudhishthir in that battle. Thereafter, a very fierce and thrilling battle began to take place in the battlefield between the warriors of Kalinga and the great mind Bhimsen. Who was the destroyer of the entire world and had a fierce form and was very scary. 40-41॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि धृष्टद्युम्नद्रोणयुद्धे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें धृष्टद्युम्न और द्रोणका युद्धविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥