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mahabharat 6.50.44: इंद्रधनुषी रंग की झंडियाँ उस ध्वज की शोभा बढ़ा रही थीं। वह ध्वज आकाश में ऐसे हिल रहा था जैसे कोई पक्षी बिना किसी सहारे के उड़ रहा हो। दूर से वह गंधर्वनगर जैसा लग रहा था। 44.   |   mahabharat अध्याय 6.50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 50: युधिष्ठिरकी चिन्ता, भगवान‍् श्रीकृष्णद्वारा आश्वासन, धृष्टद्युम्नका उत्साह तथा द्वितीय दिनके युद्धके लिये क्रौंचारुणव्यूहका निर्माण  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  6.50.44 
इन्द्रायुधसवर्णाभि: पताकाभिरलङ्कृत:।
आकाशग इवाकाशे गन्धर्वनगरोपम:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इंद्रधनुषी रंग की झंडियाँ उस ध्वज की शोभा बढ़ा रही थीं। वह ध्वज आकाश में ऐसे हिल रहा था जैसे कोई पक्षी बिना किसी सहारे के उड़ रहा हो। दूर से वह गंधर्वनगर जैसा लग रहा था। 44.
 
Rainbow coloured flags enhanced the beauty of that flag. That flag moved in the sky like a bird flying in the sky without any support. From a distance it looked like Gandharvanagar. 44.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)