श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 5: पंचमहाभूतों तथा सुदर्शनद्वीपका संक्षिप्त वर्णन  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  6.5.14-15 
नदीजलप्रतिच्छन्न: पर्वतैश्चाभ्रसंनिभै:।
पुरैश्च विविधाकारै रम्यैर्जनपदैस्तथा॥ १४॥
वृक्षै: पुष्पफलोपेतै: सम्पन्नधनधान्यवान्।
लवणेन समुद्रेण समन्तात् परिवारित:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यह नाना प्रकार की नदियों के जल से आच्छादित है, मेघ के समान ऊँचे पर्वतों से सुशोभित है, नाना प्रकार के नगरों, सुन्दर जनपदों और फल-फूलों से युक्त वृक्षों से सुशोभित है। यह द्वीप नाना प्रकार की सम्पत्तियों और ऐश्वर्यों से युक्त है। लवण सागर ने इसे चारों ओर से घेर रखा है। 14-15॥
 
It is covered with the waters of different types of rivers, decorated with the highest mountains like clouds, adorned with various types of cities, beautiful districts and trees full of fruits and flowers. This island is blessed with various kinds of wealth and abundance. The salt sea has surrounded it from all sides. 14-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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