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mahabharat 6.5.12: परंतु तर्क से अचिन्त्य भावों को सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। जो प्रकृति से परे है, वही अचिन्त्य स्वरूप है। 12॥   |   mahabharat अध्याय 6.5: पंचमहाभूतों तथा सुदर्शनद्वीपका संक्षिप्त वर्णन   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 5: पंचमहाभूतों तथा सुदर्शनद्वीपका संक्षिप्त वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.5.12 
अचिन्त्या: खलु ये भावा न तांस्तर्केण साधयेत्।
प्रकृतिभ्य: परं यत् तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
परंतु तर्क से अचिन्त्य भावों को सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। जो प्रकृति से परे है, वही अचिन्त्य स्वरूप है। 12॥
 
But one should not try to prove the unthinkable feelings through logic. That which is beyond nature is the form of unthinkable. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)