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mahabharat 6.49.10-12: मैंने, गांधारी और विदुर ने उसे सदैव मना किया है, जमदग्निपुत्र परशुराम और महात्मा व्यासजी ने भी उसे युद्ध से रोकने का प्रयत्न किया है; तथापि कर्ण, शकुनि और दु:शासन के प्रभाव में आकर पापी दुर्योधन सदैव युद्ध करने के लिए उद्यत रहा है। उसने पाण्डवों की कभी कोई बात नहीं समझी ॥10-12॥   |   mahabharat अध्याय 6.49: शंखका युद्ध, भीष्मका प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिनके युद्धकी समाप्ति   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 49: शंखका युद्ध, भीष्मका प्रचण्ड पराक्रम तथा प्रथम दिनके युद्धकी समाप्ति  »  श्लोक 10-12
 
 
श्लोक  6.49.10-12 
वार्यमाणो मया नित्यं गान्धार्या विदुरेण च॥ १०॥
जामदग्न्येन रामेण व्यासेन च महात्मना।
दुर्योधनो युध्यमानो नित्यमेव हि संजय॥ ११॥
कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च पापकृत्।
दु:शासनस्य च तथा पाण्डवान् नान्वचिन्तयत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मैंने, गांधारी और विदुर ने उसे सदैव मना किया है, जमदग्निपुत्र परशुराम और महात्मा व्यासजी ने भी उसे युद्ध से रोकने का प्रयत्न किया है; तथापि कर्ण, शकुनि और दु:शासन के प्रभाव में आकर पापी दुर्योधन सदैव युद्ध करने के लिए उद्यत रहा है। उसने पाण्डवों की कभी कोई बात नहीं समझी ॥10-12॥
 
I, Gandhari and Vidur have always forbidden him, Jamdagni's son Parshuram and Mahatma Vyasji have also tried to stop him from war; However, under the influence of Karna, Shakuni and Dushasan, the sinful Duryodhana has always been determined to fight. He never understood anything from the Pandavas. 10-12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)