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श्लोक 6.46.50  |
केतुना पञ्चतारेण तालेन भरतर्षभ।
राजतेन महाबाहुरुच्छ्रितेन महारथे।
बभौ भीष्मस्तदा राजंश्चन्द्रमा इव मेरुणा॥ ५०॥ |
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| अनुवाद |
| हे भरतश्रेष्ठ! महाबाहु भीष्म अपने विशाल रथ पर बैठे हुए, पाँच तारों से सुशोभित चाँदी की ध्वजा के साथ मेरु पर्वत के शिखर पर स्थित चन्द्रमा के समान शोभा पा रहे थे। |
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| O best of the Bharatas! The mighty-armed Bhishma, seated on his huge chariot, looked as beautiful as the moon situated on the peak of Mount Meru with a silver flag adorned with five stars. |
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इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे षट्चत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें दोनों सेनाओंका घमासान युद्धविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४६॥
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