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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 46: कौरव-पाण्डव-सेनाका घमासान युद्ध  »  श्लोक 13-15
 
 
श्लोक  6.46.13-15 
गजानां पादरक्षास्तु व्यूढोरस्का: प्रहारिण:।
ऋष्टिभिश्च धनुर्भिश्च विमलैश्च परश्वधै:॥ १३॥
गदाभिर्मुसलैश्चैव भिन्दिपालै: सतोमरै:।
आयसै: परिघैश्चैव निस्त्रिंशैर्विमलै: शितै:॥ १४॥
प्रगृहीतै: सुसंरब्धा द्रवमाणास्ततस्तत:।
व्यदृश्यन्त महाराज परस्परजिघांसव:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
महाराज! हाथियों के पैरों की रक्षा करने वाले योद्धा, जिनकी छाती चौड़ी और विशाल थी, बड़े क्रोध में भरकर इधर-उधर दौड़ रहे थे और हाथों में ऋष्टि, धनुष, चमकती हुई कुल्हाड़ियाँ, गदा, मूसल, भिण्डीपाल, तोमर, लोहे के चक्र और तीक्ष्ण धार वाली चमकीली तलवारें आदि अस्त्र-शस्त्र लेकर एक-दूसरे को मारने के लिए आतुर दिख रहे थे।
 
Maharaj! The warriors guarding the legs of the elephants, whose chests were broad and huge, were running here and there filled with great anger and were looking eager to kill one another with the weapons like rishtis, bows, shining axes, maces, pestles, Bhindipalas, Tomaras, iron circles and bright swords with sharp edges etc. in their hands.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)