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mahabharat 6.45.87: हे पुरुषश्रेष्ठ! जहाँ कहीं भी दृष्टि जाती थी, वहाँ रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सेनाएँ बार-बार युद्ध करती हुई दिखाई देती थीं।   |   mahabharat अध्याय 6.45: उभय पक्षके सैनिकोंका द्वन्द्व-युद्ध   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 45: उभय पक्षके सैनिकोंका द्वन्द्व-युद्ध  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  6.45.87 
तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते रथवारणपत्तय:।
सादिनश्च नरव्याघ्र युध्यमाना मुहुर्मुहु:॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! जहाँ कहीं भी दृष्टि जाती थी, वहाँ रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सेनाएँ बार-बार युद्ध करती हुई दिखाई देती थीं।
 
O best of men! Wherever one looked, one could see chariots, elephants, horsemen and infantry fighting again and again. 87.
 
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वन्द्वयुद्धे पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वन्द्व-युद्धविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)