श्लोक 1: संजय कहते हैं - हे प्रजानाथ! उस भयंकर दिन के प्रथम भाग में राजाओं के शरीरों को नष्ट करने वाला भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥1॥
श्लोक 2: कौरव और सृंजयवंशी योद्धा एक-दूसरे को परास्त करने की इच्छा से सिंहों के समान गर्जना कर रहे थे। उनकी गर्जना पृथ्वी और आकाश में गूँज रही थी॥2॥
श्लोक 3: तुरही और शंखों की ध्वनि सैनिकों के जयघोष से गूंज उठी। वीर योद्धा एक-दूसरे पर गरजने लगे।
श्लोक 4-6: हे भरतश्रेष्ठ! पंजों की टहनियों से टकराती धनुष की ध्वनि, पैदल सैनिकों के पैरों की ध्वनि, घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों के चाबुकों और अंकुशों की ध्वनि, शस्त्रों की झनकार और एक-दूसरे पर आक्रमण करते हाथियों के घंटियों की ध्वनि - ये सभी ध्वनियाँ मिलकर एक भयानक ध्वनि उत्पन्न कर रही थीं, जिससे रीढ़ में सिहरन दौड़ रही थी। इसके अतिरिक्त, रथों के पहियों की घरघराहट सुनाई देने लगी, जो बादलों की भयानक गर्जना के समान थी।
श्लोक 7: सभी कौरव सैनिकों ने अपने हृदय कठोर कर लिए, अपने प्राणों को जोखिम में डाल दिया और अपने ध्वज ऊंचे फहराते हुए पांडवों पर आक्रमण करने लगे।
श्लोक 8: राजन! तत्पश्चात् शान्तनुनन्दन भीष्म उस रणभूमि में मृत्युदण्ड के समान भयंकर धनुष लेकर अर्जुन की ओर दौड़े॥8॥
श्लोक 9: वहाँ से महाबली अर्जुन भी अपना प्रसिद्ध गाण्डीव धनुष लेकर युद्धभूमि के मुहाने पर गंगानन्दन भीष्म की ओर दौड़े।
श्लोक 10: वे दोनों कुरुवंश के सिंह थे और एक-दूसरे को मारने के इच्छुक थे। पराक्रमी भीष्म भी अर्जुन को घायल करके भी उसे युद्ध से नहीं रोक सके॥10॥
श्लोक 11: राजन! इसी प्रकार पाण्डु नन्दन अर्जुन भी युद्ध में भीष्म को परास्त न कर सके। उधर महाधनुर्धर सत्य ने कृतवर्मा पर आक्रमण कर दिया। 11॥
श्लोक 12-13h: दोनों में बड़ा भयंकर और रोमांचकारी युद्ध हुआ। सात्यकि ने कृतवर्मा को और कृतवर्मा ने सात्यकि को भयंकर बाणों से घायल कर दिया और वे एक दूसरे को बहुत पीड़ा पहुँचाने लगे।
श्लोक 13-14h: वे दोनों महाबली वीर बाणों से बिंधे हुए वसन्त ऋतु में खिले हुए दो पुष्पित पलाश वृक्षों के समान प्रतीत हो रहे थे।
श्लोक 14-15: अभिमन्यु ने महाधनुर्धर बृहद्बल के साथ युद्ध किया । प्रजानाथ ! उस युद्ध में कोसल के राजा बृहद्बल ने अभिमन्यु की ध्वजा काट दी और सारथि को मार डाला । 14-15॥
श्लोक 16: महाराज! अपने सारथि के मारे जाने पर सुभद्रापुत्र अभिमन्यु अत्यन्त क्रोधित हो उठा और उसने बृहद्बल को नौ बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 17-18h: तत्पश्चात् शत्रुमर्दन अभिमन्यु ने दो अन्य तीक्ष्ण बाणों से बृहद्बल की ध्वजा काट डाली, फिर एक बाण से उसके अंगरक्षक को और दूसरे से सारथि को मार डाला। तब वे दोनों अत्यन्त क्रोधित होकर एक-दूसरे को तीक्ष्ण छुरियों से छेदने लगे। 17 1/2॥
श्लोक 18-19h: भीमसेन आपके पराक्रमी पुत्र दुर्योधन के साथ युद्ध करने लगे, जो युद्ध में अभिमानी और अहंकारी था तथा आपका पूर्व शत्रु था। ॥18 1/2॥
श्लोक 19-20h: वे दोनों ही महान् वीर कुरुकुल के सेनापति थे। वे युद्ध में एक-दूसरे पर बाणों की वर्षा करने लगे। 19 1/2॥
श्लोक 20-21h: भरत! वे दोनों महाबुद्धिमान, अस्त्रविद्या में निपुण और विचित्र प्रकार से युद्ध करने वाले थे। उन्हें देखकर समस्त प्राणी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गए।
श्लोक 21-22h: दु:शासन आगे बढ़ा और उसने अपने अनेक तीखे बाणों से महाबली नकुल को घायल कर दिया, जो उसके महत्वपूर्ण स्थानों में जा लगे।
श्लोक 22-23: तब माद्रीपुत्र नकुल ने हँसते हुए तीखे बाणों से दु:शासन का धनुष, बाण और ध्वजा काट डाले और उसे पच्चीस बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 24: इसके बाद उस महायुद्ध में आपके वीर पुत्र ने अपने बाणों से नकुल के घोड़ों को मार डाला और उसकी ध्वजा को भी गिरा दिया।
श्लोक 25: महाबली सहदेव उस महायुद्ध में विजय पाने के लिए प्रयत्नशील थे। आपके पुत्र दुर्मुख ने उन पर आक्रमण कर बाणों की वर्षा से उन्हें घायल कर दिया।
श्लोक 26: तत्पश्चात् वीर सहदेव ने उस महायुद्ध में अत्यन्त तीक्ष्ण बाण से दुर्मुख के सारथि को मार डाला ॥26॥
श्लोक 27: वे दोनों युद्धोन्मादी वीर अपने पूर्वकृत पापों का बदला लेने के लिए युद्धभूमि में एक-दूसरे से भिड़ गये और अपने भयंकर बाणों से एक-दूसरे को भयभीत करने लगे।
श्लोक 28: राजा युधिष्ठिर ने स्वयं मद्रराज शल्य पर आक्रमण किया। राजन! मद्रराज ने युधिष्ठिर के धनुष के दो टुकड़े कर दिये। 28॥
श्लोक 29-30: तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने टूटे हुए धनुष को फेंक दिया और दूसरा धनुष लेकर, जो अधिक वेगवान और शक्तिशाली था, मद्रराज शल्य को मुड़ी हुई गांठों वाले तीखे बाणों से आच्छादित कर दिया। फिर क्रोध में भरकर उन्होंने कहा - 'खड़े रहो, खड़े रहो'॥29-30॥
श्लोक 31-32h: भरतनंदन! एक ओर से धृष्टद्युम्न ने द्रोणाचार्य पर आक्रमण किया। तब द्रोण ने अत्यन्त क्रोधित होकर धृष्टद्युम्न के उस प्रबल धनुष को, जो युद्ध में दूसरों को मारने के लिए प्रयुक्त होता था, तीन टुकड़ों में तोड़ दिया। 31 1/2॥
श्लोक 32-33h: तत्पश्चात् उस रणभूमि में उन्होंने दूसरा कालदण्ड के समान अत्यन्त भयंकर बाण चलाया, जो धृष्टद्युम्न के शरीर में धँस गया ॥32 1/2॥
श्लोक 33-34: तत्पश्चात् द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने दूसरा धनुष लेकर चौदह बाण चलाकर युद्धभूमि में द्रोणाचार्य को घायल कर दिया। तब दोनों एक-दूसरे पर अत्यन्त क्रोधित हो गये और भयंकर युद्ध करने लगे।
श्लोक 35: महाराज! उस युद्ध में शक्तिशाली शंख ने महाबली योद्धा भूरिश्रवा पर आक्रमण करके कहा, 'दृढ़ रहो, दृढ़ रहो।'
श्लोक 36: वीर शंख ने युद्धस्थल में भूरिश्रवा की दाहिनी भुजा काट डाली; फिर भूरिश्रवा ने भी शंख की गर्दन पर बाण मारा ॥36॥
श्लोक 37: राजन! उस रणभूमि में इन्द्र और वृत्रासुर जैसे अभिमानी वीरों में घोर युद्ध हुआ॥37॥
श्लोक 38: प्रजानाथ! असीम आत्मविश्वास से युक्त महारथी धृष्टकेतु ने युद्धस्थल में क्रोधित होकर बाह्लीक पर आक्रमण किया। 38.
श्लोक 39: राजन! कुपित बाह्लीक ने युद्धस्थल में धृष्टकेतु को अनेक बाणों से घायल कर दिया और सिंह के समान दहाड़ने लगा।
श्लोक 40: तब चेदिराज धृष्टकेतु अत्यन्त क्रोधित हो गये और जैसे मतवाला हाथी मतवाले हाथी पर आक्रमण करता है, उसी प्रकार उन्होंने बाह्लीक पर नौ बाण चलाकर उसे युद्धस्थल में ही क्षत-विक्षत कर दिया।
श्लोक 41: उस युद्धस्थल में दोनों वीर क्रोध और क्रोध में भरे हुए मंगल और बुध के समान बारंबार गर्जना करते हुए युद्ध कर रहे थे।
श्लोक 42: जिस प्रकार इन्द्र ने युद्ध में बल नामक दैत्य पर आक्रमण किया था, उसी प्रकार क्रूर घटोत्कच ने अलम्बुष नामक भयानक दैत्य पर आक्रमण किया।
श्लोक 43: हे भरतपुत्र! क्रोध में भरे हुए घटोत्कच ने महाबली अम्बुष राक्षस को नब्बे तीखे बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 44: तत्पश्चात् अलम्बुष ने भी युद्धस्थल में भीमसेन के पुत्र महाबली घटोत्कच को भी झुके हुए बाणों से अनेक प्रकार से घायल कर दिया।
श्लोक 45: जैसे देवताओं और दानवों के युद्ध में बलवान बलासुर और इन्द्र घायल हो गये थे, उसी प्रकार इस युद्ध में एक-दूसरे के बाणों से घायल होकर अलम्बुष और घटोत्कच भी अद्भुत शोभा पा रहे थे।
श्लोक 46-48: राजन! महाबली शिखण्डी ने युद्धस्थल में द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पर आक्रमण किया। तब अश्वत्थामा ने क्रोधित होकर अपने निकट आये शिखण्डी को तीक्ष्ण तलवार से घोर घायल करके उसे कंपा दिया। महाराज! तत्पश्चात शिखण्डी ने भी पीतवर्णी तीक्ष्ण तलवार से द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को अत्यन्त घायल कर दिया; तत्पश्चात वे दोनों नाना प्रकार के बाणों द्वारा एक दूसरे पर आक्रमण करने लगे। 46-48॥
श्लोक 49: महाराज! सेनापति विराट ने बड़ी तेजी से वीर योद्धा भगदत्त पर आक्रमण किया। फिर दोनों में युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 50: भरत! विराट् अत्यन्त क्रोधित हो गए और भगदत्त पर बाणों की वर्षा करने लगे, मानो मेघ पर्वत पर जल की बूँदें बरसा रहा हो।
श्लोक 51: फिर जैसे बादल उगते हुए सूर्य को ढक लेता है, उसी प्रकार भगदत्त ने युद्धभूमि में बाणों की वर्षा से पृथ्वी के स्वामी विराट को ढक दिया।
श्लोक 52-53h: भरतनंदन! शरद्वान के पुत्र कृपाचार्य ने केकयराज बृहत्क्षत्र पर आक्रमण करके उन्हें बाणों की वर्षा से ढक दिया। तब केकयराज ने भी क्रोधित होकर कृपाचार्य को बाणों की वर्षा से ढक दिया।
श्लोक 53-54: भरत! वे दोनों वीर योद्धा एक-दूसरे के घोड़े मार डालने लगे, एक-दूसरे के धनुष तोड़ डालने लगे, रथहीन हो गए और क्रोध में भरकर तलवारें लेकर आमने-सामने लड़ने के लिए खड़े हो गए। फिर उनमें बड़ा भयंकर और भयानक युद्ध होने लगा। 53-54।
श्लोक 55: राजन ! उधर शत्रुओं को पीड़ा देनेवाले द्रुपद ने बड़े हर्ष से सिन्धुराज जयद्रथ पर आक्रमण किया। जयद्रथ भी बहुत प्रसन्न हुआ ॥55॥
श्लोक 56: तत्पश्चात् सिन्धुराज जयद्रथ ने युद्ध में द्रुपद को तीन बाणों से अत्यन्त घायल कर दिया और प्रत्युत्तर में द्रुपद ने भी उसे बींध डाला ॥56॥
श्लोक 57: उन दोनों के बीच का वह भयंकर और अत्यन्त भयानक युद्ध, शुक्र और मंगल के बीच के संघर्ष के समान, आँखों को आनन्द देने वाला था।
श्लोक 58: आपके पुत्र विकर्ण ने अपने वेगवान घोड़ों के साथ महाबली सुतसोम पर आक्रमण किया। तत्पश्चात् उन दोनों में भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया।
श्लोक 59: विकर्ण अपने बाणों से घायल करके भी सुतसोम को विचलित नहीं कर सके। इसी प्रकार सुतसोम भी विकर्ण को विचलित नहीं कर सके। उन दोनों का यह पराक्रम अद्भुत प्रतीत हो रहा था। 59.
श्लोक 60: पुरुषों में श्रेष्ठ और महाबली चेकितान ने पाण्डवों पर अत्यन्त क्रोधित होकर सुशर्मा पर आक्रमण किया ॥60॥
श्लोक 61: महाराज! सुशर्मा ने बाणों की भारी वर्षा करके महारथी चेकितान को युद्ध में आगे बढ़ने से रोक दिया।
श्लोक 62: तत्पश्चात् चेकितान ने भी क्रोध में भरकर उस महासमर में अपने बाणों की वर्षा से सुशर्मा को ढक लिया, जैसे कोई विशाल मेघ जल की वर्षा से पर्वत को ढक लेता है।
श्लोक 63: राजा! वीर शकुनि ने वीर प्रतिविन्ध्य पर उसी प्रकार आक्रमण किया, जैसे पागल सिंह हाथी पर आक्रमण करता है।
श्लोक 64: जैसे इन्द्र युद्धभूमि में राक्षस को घायल कर देते हैं, उसी प्रकार युधिष्ठिर के पुत्र प्रतिविन्ध्य ने अत्यन्त कुपित होकर अपने तीखे बाणों से सुबलपुत्र शकुनि को घायल कर दिया।
श्लोक 65: यहाँ तक कि युद्ध में अपने को ही घायल करने वाले प्रतिविन्ध्य को भी अत्यन्त बुद्धिमान शकुनि ने मुड़ी हुई गांठों वाले बाणों से घायल कर दिया।
श्लोक 66: राजेंद्र! श्रुतकर्मा ने युद्धभूमि में कम्बोज के राजा महारथी सुदक्षिण पर आक्रमण किया। 66॥
श्लोक 67: तत्पश्चात् सुदक्षिण ने सहदेव के पुत्र महारथी श्रुतकर्मा को समरांगण में घायल कर दिया; फिर भी वह उन्हें विचलित न कर सका। वह मैनाक पर्वत के समान स्थिर खड़ा रहा ॥67॥
श्लोक 68: तत्पश्चात् श्रुतकर्मा क्रोधित हो गये और उन्होंने अपने अनेक बाणों से महाबली योद्धा कम्बोजराज को चारों ओर से घायल कर दिया।
श्लोक 69: उधर शत्रुओं को कष्ट देने में तत्पर रहने वाले इरावान ने युद्ध में क्रोधित होकर शत्रुओं का नाश करने वाले श्रुतायुष पर आक्रमण कर दिया। श्रुतायुष भी उसका सामना करने का प्रयत्न कर रहा था। 69॥
श्लोक 70: वह महाबली अर्जुनपुत्र इरावान रणभूमि में श्रुतायुष के घोड़ों को मारकर बड़े जोर से गर्जना करने लगा और उसकी सेना को बाणों से आच्छादित कर दिया ॥70॥
श्लोक 71: यह देखकर श्रुतायुष ने भी क्रोधित होकर युद्धस्थल में अपनी गदा के प्रहार से अर्जुनपुत्र इरावान के घोड़ों को मार डाला। तत्पश्चात् उन दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। 71॥
श्लोक 72: अवन्तिदेश के राजकुमार विन्द और अनुविन्द ने सेना और पुत्र सहित वीर योद्धा कुन्तिभोज के साथ युद्ध आरम्भ किया ॥72॥
श्लोक 73: वहाँ मैंने उन दोनों का अद्भुत और भयंकर पराक्रम देखा। वे दोनों अपनी विशाल सेना के साथ एक-दूसरे के सामने दृढ़तापूर्वक खड़े थे।
श्लोक 74: अनुविन्द ने कुंतीभोज पर गदा से आक्रमण किया। तब कुंतीभोज ने भी तुरन्त उसे अपने बाणों से ढक दिया।
श्लोक 75: कुंतिभोज के पुत्र ने भी अपनी तलवारों से विन्दक को घायल कर दिया। बदले में विन्दने ने भी कुंतिभोज के पुत्र को विकृत कर दिया। वह अद्भुत घटना घटी ॥75॥
श्लोक 76: महाराज! केकय राजकुमारों के पाँचों भाई अपनी सेना लेकर आए और उन्होंने गांधार के उन पाँच वीर योद्धाओं से युद्ध आरम्भ कर दिया जो युद्ध क्षेत्र में अपनी विशाल सेना के साथ खड़े थे।
श्लोक 77-78h: आपके पुत्र वीरबाहु ने विराटपुत्र महारथी उत्तरा के साथ युद्ध करके उसे तीखे बाणों से घायल कर दिया। उत्तरा ने भी वीरबाहु को अपने तीखे बाणों का निशाना बनाकर उसे घायल कर दिया।
श्लोक 78-79: हे राजन! चेदिराज ने युद्धभूमि में उल्लू पर आक्रमण कर उसे बाणों की वर्षा से घायल कर दिया। उल्लू ने भी अपने तीखे पंखयुक्त बाणों से चेदिराज को गहरे घाव पहुँचाए। 78-79.
श्लोक 80: हे प्रजानाथ! तब उन दोनों में घोर युद्ध होने लगा। वे दोनों वीर योद्धा, जो किसी से पराजित नहीं हो सकते थे, अत्यन्त कुपित होकर एक-दूसरे को नोचने लगे।
श्लोक 81: इस प्रकार उस भीषण युद्ध में आपके और पाण्डव पक्ष के रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सेना वाले हजारों योद्धाओं के बीच द्वन्द्व युद्ध चल रहा था।
श्लोक 82: महाराज! कुछ क्षणों तक तो वह युद्ध देखने में बड़ा सुन्दर प्रतीत हुआ; फिर उन्मत्तों के समान भयंकर युद्ध होने लगा। उस समय किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
श्लोक 83: उस युद्धस्थल में हाथी हाथी से भिड़ गया, सारथी सारथी पर टूट पड़ा, घुड़सवार घुड़सवार पर टूट पड़ा और पैदल घुड़सवार पैदल से लड़ने लगा। 83.
श्लोक 84: थोड़ी ही देर में युद्धभूमि में वीर सैनिकों के बीच घमासान एवं भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया।
श्लोक 85: वहाँ आये हुए ऋषियों, सिद्धों और चारणों ने पृथ्वी पर हो रहे उस युद्ध को देवताओं और दानवों के बीच होने वाले युद्ध के समान भयंकर देखा।
श्लोक 86: आर्य! तत्पश्चात् सहस्रों हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सेनाएँ उपर्युक्त द्वन्द्व-विधि का उल्लंघन करके परस्पर युद्ध करने लगीं।
श्लोक 87: हे पुरुषश्रेष्ठ! जहाँ कहीं भी दृष्टि जाती थी, वहाँ रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सेनाएँ बार-बार युद्ध करती हुई दिखाई देती थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥