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श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 44: कौरव-पाण्डवोंके प्रथम दिनके युद्धका आरम्भ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.44.22 
नोपशाम्यति निर्घोषो धनुषां कूजतां तथा।
विनिश्चेरु: शरा दीप्ता ज्योतींषीव नभस्तलात्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
वहाँ धनुषों की टंकार की ध्वनि कभी बंद नहीं हुई। उन धनुषों से चमकते हुए बाण निकल रहे थे, मानो आकाश में तारे हों।
 
There the sound of the twanging bows never ceased. Bright arrows were appearing from those bows, like stars in the sky.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)