श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 44: कौरव-पाण्डवोंके प्रथम दिनके युद्धका आरम्भ  » 
 
 
अध्याय 44: कौरव-पाण्डवोंके प्रथम दिनके युद्धका आरम्भ
 
श्लोक 1:  धृतराष्ट्र ने पूछा - संजय! जब मेरे पुत्रों और पाण्डवों ने इस प्रकार अपनी-अपनी सेनाएँ खड़ी कर लीं, तब उनमें से किसने पहले आक्रमण किया - कौरवों ने या पाण्डवों ने?॥1॥
 
श्लोक 2:  संजय ने कहा: हे राजन! आपका पुत्र दुर्योधन अपने भाइयों सहित सेना लेकर भीष्म को आगे ले गया।
 
श्लोक 3:  इसी प्रकार सब पाण्डव भी प्रसन्न मन से भीमसेन को आगे करके भीष्म से युद्ध करने की इच्छा रखते हुए आगे बढ़े॥3॥
 
श्लोक 4-5:  तभी दोनों सेनाओं में सिंहों की दहाड़, चीत्कार, क्रकच, नरसिंह, भेरी, मृदंग और ढोल जैसे बाजे की ध्वनि तथा घोड़ों और हाथियों की गर्जना गूँजने लगी। पांडव सैनिकों ने हम पर आक्रमण किया और हमने भी भयंकर गर्जना करते हुए उन पर आक्रमण किया। इस प्रकार एक अत्यंत भयंकर युद्ध आरंभ हो गया।
 
श्लोक 6:  उस भीषण मारकाट से भरे हुए महासमर में आपके पुत्रों और पाण्डवों की विशाल सेनाएँ शंखों और नगाड़ों की ध्वनि से ऐसे काँपने लगीं, जैसे प्रचण्ड वायु से वन काँप उठते हैं।
 
श्लोक 7:  जब उस अशुभ समय में राजाओं, हाथियों, घोड़ों और रथों से परिपूर्ण दोनों पक्षों की सेनाएँ एक-दूसरे के सम्मुख और निकट आ पहुँचीं, तब उनका भयंकर कोलाहल, वायु से क्षुब्ध सागरों के समान, सम्पूर्ण दिशाओं में गूँजने लगा।
 
श्लोक 8:  वह रोमांचकारी, भयानक ध्वनि निकलते ही महाबाहु भीमसेन बैल के समान गर्जना करने लगे।
 
श्लोक 9:  भीमसेन की वह गर्जना सर्वत्र सुनाई देने लगी, जिसमें शंखों और नगाड़ों की गम्भीर ध्वनि, हाथियों की चिंघाड़ और सैनिकों की गर्जना भी दब गई।
 
श्लोक 10:  उस सेना में हजारों घोड़े जोर-जोर से हिनहिना रहे थे; परन्तु भीमसेन की गर्जना की आवाज अन्य सब आवाजों से ऊंची थी।
 
श्लोक 11:  वह मेघ के समान गम्भीर स्वर में दहाड़ रहा था। उसकी वाणी इन्द्र के वज्र के समान भयंकर थी। उसकी गर्जना सुनकर आपके सभी सैनिक भयभीत हो गए।
 
श्लोक 12:  जैसे सिंह की दहाड़ सुनकर अन्य जंगली पशु भयभीत हो जाते हैं, वैसे ही वीर भीमसेन की दहाड़ सुनकर कौरव सेना के समस्त वाहन भयभीत हो गए और मल-मूत्र त्यागने लगे॥12॥
 
श्लोक 13:  भीमसेन ने अपना भयंकर रूप प्रकट करके, मेघ के समान गर्जना करते हुए तथा आपके पुत्रों को भयभीत करते हुए कौरव सेना पर आक्रमण किया।
 
श्लोक 14:  महाधनुर्धर भीमसेन को आते देख दुर्योधन के भाइयों (तथा अन्य वीरों) ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और बाणों की वर्षा से उन्हें ढक दिया, जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं।
 
श्लोक 15-d1:  नरेश्वर! आपके पुत्र दुर्योधन, दुर्मुख, दु:शला, शल, अतिरथी दु:शासन, दुर्मर्षण, विविंशति, चित्रसेन, महाबली विकर्ण, पुरुमित्र, जय, भोज और महाबली भूरिश्रवा - ये सभी योद्धा अपने विशाल धनुषों से काँपते हुए, विषैले सर्पों के समान हाथों में बाण लिए हुए, बिजली से चमकते हुए बादलों के समान प्रतीत हो रहे थे। ये सभी भूपाल पाण्डव सेना के सामने (भीमसेन को घेरकर) खड़े थे। 15-17
 
श्लोक 18-19:  तत्पश्चात् द्रौपदी के पाँचों पुत्र, महारथी अभिमन्यु, नकुल, सहदेव और द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न - ये सभी योद्धा अत्यन्त वेगवान तथा वज्र के समान वेगवान तीखे बाणों द्वारा पर्वत शिखरों के समान धृतराष्ट्र के पुत्रों पर टूट पड़े ॥18-19॥
 
श्लोक 20:  उस प्रथम युद्ध में जब धनुषों की भयंकर टंकार और ताल की टकराहट सुनाई दे रही थी, तब आपके पक्ष से या पाण्डव पक्ष से कोई भी युद्ध से विमुख नहीं हुआ।
 
श्लोक 21:  हे भरतश्रेष्ठ! उस समय मैंने द्रोणाचार्य के उन शिष्यों की चपलता देखी। वे बड़े वेग से बाण चलाते और लक्ष्य को भेदते थे।
 
श्लोक 22:  वहाँ धनुषों की टंकार की ध्वनि कभी बंद नहीं हुई। उन धनुषों से चमकते हुए बाण निकल रहे थे, मानो आकाश में तारे हों।
 
श्लोक 23:  हे भरतपुत्र! अन्य सभी राजागण दर्शकों की भाँति उस भीषण एवं अद्भुत युद्ध को देखने लगे।
 
श्लोक 24:  राजा! उन सबने बचपन में एक-दूसरे को अपमानित किया था। यह सब स्मरण करके वे सभी महारथी क्रोध से भर गए और परस्पर वैमनस्य के कारण युद्ध में विजयी होने के लिए अत्यन्त परिश्रम करने लगे॥ 24॥
 
श्लोक 25:  हाथियों, घोड़ों और रथों से सुसज्जित कौरव और पाण्डव सेनाएँ युद्धभूमि में ऐसी शोभायमान हो रही थीं, मानो कैनवास पर चित्रित चित्र-चित्रमय सेनाएँ हों।
 
श्लोक 26:  तत्पश्चात् आपके पुत्र दुर्योधन की आज्ञा से अन्य सभी राजा भी धनुष-बाण लेकर अपनी-अपनी सेनाओं के साथ वहाँ पहुँचे॥26॥
 
श्लोक 27:  इसी प्रकार युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर हजारों राजा गर्जना करते हुए आपके पुत्र की सेना पर टूट पड़े।
 
श्लोक 28:  उन दोनों सेनाओं का वह संघर्ष बड़ा दुःखदायी था। सेना की धूल से आच्छादित होकर सूर्यदेव अदृश्य हो गए ॥28॥
 
श्लोक 29:  कुछ लोग लड़ते, कुछ भाग जाते और कुछ भागकर वापस आ जाते। इस मामले में हमारे सैनिकों और दुश्मन के सैनिकों में कोई अंतर नहीं दिखता था।
 
श्लोक 30:  जब वह अत्यन्त भयंकर एवं भयंकर युद्ध चल रहा था, तब आपके चाचा भीष्म समस्त सेनाओं के ऊपर उठकर अपने तेज से चमक रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)