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mahabharat 6.43.75: प्रभु! मैं आपके आगमन से बहुत प्रसन्न हूँ; इसलिए मैं सदैव उठकर आपकी विजय की कामना करूँगा। मैं आपसे यह सत्य कह रहा हूँ।'   |   mahabharat अध्याय 6.43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  6.43.75 
प्रीतस्तेऽभिगमेनाहं जयं तव नराधिप।
आशासिष्ये सदोत्थाय सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! मैं आपके आगमन से बहुत प्रसन्न हूँ; इसलिए मैं सदैव उठकर आपकी विजय की कामना करूँगा। मैं आपसे यह सत्य कह रहा हूँ।'
 
Lord! I am very happy with your arrival; therefore I will always get up and wish for your victory. I am telling you this truth.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)