द्रोण उवाच
न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद् रथे स्थितम्।
युध्यमानं सुसंरब्धं शरवर्षौघवर्षिणम्॥ ६४॥
अनुवाद
द्रोणाचार्य बोले - हे भाई! जब मैं अपने रथ पर बैठकर, क्रोधित होकर, बाणों की वर्षा करते हुए युद्ध में तत्पर रहता हूँ, उस समय मुझे कोई ऐसा शत्रु नहीं दिखाई देता जो मुझे मार सके।
Dronacharya said - Dear brother! When I am seated on my chariot, enraged and engaged in battle, showering arrows, at that time I do not see any enemy who can kill me. 64.