युधिष्ठिर उवाच
जयमाशास्व मे ब्रह्मन् मन्त्रयस्व च मद्धितम्।
युद्धॺस्व कौरवस्यार्थे वर एष वृतो मया॥ ५८॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा - ब्रह्मन्! आप मेरी विजय की कामना करते हैं और मेरे हित के लिए मुझे उपदेश देते रहते हैं; आप दुर्योधन की ओर से ही युद्ध करें। यही वर मैंने आपसे माँगा है।
Yudhishthira said - Brahman! You wish for my victory and keep giving me advice for my benefit; fight the war on Duryodhan's side only. This is the boon I have asked from you. 58.