श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  6.43.58 
युधिष्ठिर उवाच
जयमाशास्व मे ब्रह्मन् मन्त्रयस्व च मद्धितम्।
युद्धॺस्व कौरवस्यार्थे वर एष वृतो मया॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने कहा - ब्रह्मन्! आप मेरी विजय की कामना करते हैं और मेरे हित के लिए मुझे उपदेश देते रहते हैं; आप दुर्योधन की ओर से ही युद्ध करें। यही वर मैंने आपसे माँगा है।
 
Yudhishthira said - Brahman! You wish for my victory and keep giving me advice for my benefit; fight the war on Duryodhan's side only. This is the boon I have asked from you. 58.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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