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mahabharat 6.43.54: हे निष्पाप युधिष्ठिर! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुमने मेरा बहुत सम्मान किया है। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, शत्रुओं से युद्ध करो और विजय प्राप्त करो॥ 54॥   |   mahabharat अध्याय 6.43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना   ।   mahabharat पर्व 6: भीष्म पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 6: भीष्म पर्व  »  अध्याय 43: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  6.43.54 
तद् युधिष्ठिर तुष्टोऽस्मि पूजितश्च त्वयानघ।
अनुजानामि युध्यस्व विजयं समवाप्नुहि॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप युधिष्ठिर! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुमने मेरा बहुत सम्मान किया है। मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, शत्रुओं से युद्ध करो और विजय प्राप्त करो॥ 54॥
 
Sinless Yudhishthira! I am pleased with you. You have honoured me a lot. I command you, fight the enemies and achieve victory. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)